आश्वासन पाया जाता है। आज भी मानव जहाँ अपने अर्थ का सदुपयोग समझता है या कल्पना करता है वहाँ उपयोग कर अपने में सांत्वना और सुख पाता हैं। जहाँ-जहाँ तन, मन, धन रुपी अर्थ का दुरुपयोग होना समझ में आया उसकी पीड़ा व्याप्त ही हैं। पीड़ा को मानव वरता नहीं। इसलिए भी व्यवस्था के अनुरुप समाज के रूप में अर्थ का सदुपयोग प्रमाणित हो जाता है। अर्थ की सुरक्षा स्वयं ही परिवार मूलक स्वराज्य के रूप में वैभवित हो जाती है, इसलिए प्रत्येक मानव का समाज और व्यवस्था में, भागीदार होना एक अनिवार्य स्थिति है। जीवन सहज जागृति, समाज सहज अभिव्यक्ति, व्यवस्था सहज भागीदारी और व्यवहार सहज उपलब्धि है; ऐसी उपलब्धि यहाँ समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व है। यही मानव सहज स्वभाव गति प्रतिष्ठा सहज अपेक्षा आवश्यकता और उपलब्धियाँ भी हैं।
बेहोशी में, उन्माद में मनुष्य स्वभाव गति में नहीं रहता है। इस प्रकार उन्मादों, आवेशों में रहते, जितने भी मोटे आदमी हों, वह भय और शंकाओं से घिरा रहता है, इसलिए वह कमजोर होता ही है । आवेशों में कमोबेशी, आदमी में कोई ताकत रह नहीं जाती। समस्याओं से ग्रसित मानव कमजोर होता है। इसी भाँति लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद से ग्रस्त आदमी मानसिक रूप में कमजोर होता है तथा शरीर रूप में भी कमजोर होता है क्योंकि मानसिकता ही शरीर के द्वारा ताकत को प्रदर्शित करता है। इससे एक सहज निश्चय निकलता है कि “अमानवीयता मानव में, मानव से, मानव के लिए कमजोर स्थिति है।” भले ही वे राक्षस मानव, पशु मानव क्यों न हो पर वे अमानव तो है, इसलिए इन दोनों का मानवीयतापूर्ण मानव से कमजोर होना स्वाभाविक है। क्योंकि मानव का स्वभाव (मौलिकता) धीरता, वीरता, उदारता है। वहीं अमानव का अर्थात पशु और राक्षस मानव का स्वभाव हीनता, दीनता, क्रूरता ही है।
मानव सहज मौलिकता कितनी सुद़ृढ़ है, यह हर एक व्यक्ति को समझ में आता है। इससे पता चलता है कि अमानवीयता की मुक्ति स्थली, स्वयं मानवीयतापूर्ण स्वभाव ही वैभव है। इसलिए अमानवीयता का, मानवीयता पूर्वक अथवा मानवीयता की विधि से परिवर्तन होना सहज है, क्योंकि अमानवीयता को कोई भी मानव (जो अमानवीय रहता है वह भी) नहीं स्वीकारता जबकि मानवीयता को हर व्यक्ति स्वीकारता है।
मानवीयता के खोल में ही, अमानवीयता पनपती हुई देखने को मिल रही हैं। ऐसा मजबूर होने का एक ही कारण है, परंपरा में मानवीयता का जीता जागता प्रमाण, बोध गम्य होने योग्य ज्ञान, दर्शन सुलभ न होना। इसे ऐसा भी एक सर्वेक्षण किया जा सकता है कि किसी भी नशाखोर व्यक्ति से विधिवत् किसी मुद्दे पर ज्ञानार्जन, विवेकार्जन विधि से बात करें, तब हम यह पाएँगे कि नशा किया हुआ व्यक्ति भी नशा नहीं किया हुआ जैसा प्रस्तुत होना चाहता है। एक चोर, डाकू से विवेक और व्यवस्था संबंधी चर्चा कर देखें तो हम यही पाते है कि चोरी-डकैती करते हुए उसी के पक्ष में व्यवस्था व विवेक को उपयोग करते हुए नहीं मिलता