है। अपितु, इसके विपरीत जो भी करते रहता है, किया रहता है उसी की निरर्थकता को बार-बार दोहराते रहता है। इसी प्रकार लाभोन्मादी, कामोन्मादी व भोगन्मादियों से व्यवस्था और विवेक प्रयोजन विधि से विधिवत् चर्चा करके हम यह पाते है कि सभी उन्माद निरर्थक है। इसी प्रकार आज के राजनेताओं से इस मुद्दे पर चर्चा करके देखें कि वोट, नोट, बँटवारा, संतुष्टि, असंतुष्टि कब तक चल सकती है? इससे स्वस्थ व्यवस्था मिल सकती है क्या? इस पर वे कहते है कि “सबकी संतुष्टि हो नहीं सकती, इस बीच में झेलते रहना ही राजनीति है।” इन सभी वर्गों के साथ बात करने पर उनकी यह स्वीकारोक्ति है कि उन-उन कार्यों की बड़ी मजबूरी रही है, लेकिन ये सारे “उचित काम” नहीं हैं।
इन लोगों से पूछा गया कि ये ठीक नहीं है तो करते क्यों हो? इस पर वे कहते है कि “इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं हैं।” इसी प्रकार युवा पीढ़ी से पूछा गया कि, “जो कुछ भी आप लोग कर रहे है, सोच रहे है- नशाखोरी, जमाखोरी, जिम्मेदारी-विहीन कार्य आदि क्या ये ठीक है? - ऐसा पूछने पर वे कहते है कि “ईमानदारी से रोटी नहीं मिलती।” जिम्मेदारी से बात या काम किये तो पिस जाते हैं।” ऐसी दो टूक बातें युवा पीढ़ी करती है। मानवीयता के बारे में जब उनसे पूछते है तो ये कहते है “यह तो जरुरी है ।” इस तरह इन तथ्यों के आधार पर यही समझ में आता है कि अन्याय, भ्रष्टाचार, दुराचार करने वाला व्यक्ति भी मानवीयता को एक आवश्यकता के रूप में स्वीकारता है। ऐसे भी बहुत से महत्वपूर्ण लोगों की बातें की गई। इनमें धर्म गद्दी पर बैठे लोग भी रहे है, उनसे मानवीयता के संबंध में चर्चा की गई तो सभी ने मानवीयता को नकारना अनुचित बताया और मानवीयता की आवश्यकता बताई। उनकी भागीदारी के बारे में पूछने पर वे कहते है कि “भागीदारी की बात तो हम कर नहीं सकते क्योंकि हमारा अभी तक किया हुआ, इस नजरिए से, बाकी सब वृथा लगने लगता है । इसलिए हम इसे नहीं ले जा सकते।” इत्यादि।
यह भी देखने को मिला कि ख्याति प्राप्त साधु, संत, मुनि ये लोग अपने को उन सबसे अच्छा मान लेता है, यही कि वे मानवीयता से अपने को श्रेष्ठ मान लेते हैं। उनके अनुसार मानवीयता सामान्य मनुष्य की कथा है, उनके अनुसार वे स्वयं अपने को मानवीयता से अधिक श्रेष्ठ मानकर, अपने संभाषणों को समाप्त करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि साधु, सन्यासी, संत सभी मानवीयता की आवश्यकता से सहमत होते हैं। ये उस मानवीयता की मापदण्ड से भिन्न है- ऐसा समझ में आता है। लेकिन मानवता को सभी उचित ठहराते हैं। इस प्रकार सर्वाधिक लोगों को यह स्वीकृत है ही। इस विधि से मानवीयता का नाम सबको स्वीकृत है। मौलिकता भी सबको स्वीकृत है। मानवीय ज्ञान, जीवन ज्ञान है। जागृत मानव ही दृष्टा पद में हैं। अस्तित्व ज्ञान सभी मानवों को संभव है- इन बातों को रुढ़िवादी, कट्टरपंथी लोग जल्दी नहीं स्वीकारते, किन्तु विरोध करना भी नहीं बन पाता।