मे स्पष्ट है। दृष्टा, दृश्य, दर्शन का प्रमाणित होना एक आवश्यकीय तत्व रहा है। इसी क्रम में जीवावस्था के अनंतर ज्ञानावस्था की अभिव्यक्ति सहज रूप में हुई है। इन तमाम अभिव्यक्तियों में अस्तित्व सहज नियम, प्रक्रिया-वस्तु द्रव्य ही हैं।
मानव का जब से जंगल, पत्थर, धातु, जलवायु और मिट्टी पर हस्तक्षेप होता आया यह अपनी बहादुरी की दुहाई देते रहा। इस बीच मानव के साथ मानव का पाला पड़ा। फलस्वरुप विविध समुदायों के रूप में बँटा हुआ आदमी आज की तिथि में व्यक्त हैं। इस क्रम में अर्थात् इस भ्रमित क्रम में मानव मांसाहार में लटका हुआ है। मांसाहार में सबसे स्वादिष्ट मानव शरीर को होना बताया करते हैं। इस प्रकार मानव भी मांसाहार की इकाई होने के पश्चात् मानव को मांसाहार के रूप में स्वीकार लिया। यदि ऐसे ही प्रत्येक मानव में मानसिकता बन जाये, उसके लिए भी मानव को ही प्रयत्न करना पड़ेगा। मानव, मानव को जब मांसाहार का आधार बना देगा तब मांसाहार करने वाला अलग से कैसा पहचाना जाय, यह प्रश्न उभर आता है? उस स्थिति में जो सबसे बलवान होगा वह अधिक लोगों को खाएगा। अब बलवान होने की होड़ चली। यह मल्ल युद्घ वाली बात, शिलायुग तक भी तैयार हो चुकी थी। अभी की स्थिति में तकनीकी बल ज्यादा ताकतवर हुई। भीमकाय व्यक्ति को एक दुबला पतला आदमी गोली मारे, भीमकाय व्यक्ति मर जाएगा। इस प्रकार बल के आधार पर मानव को मांसाहार का आधार बनाना संभव नहीं हो पाता। इसी के साथ बलवान वाली बात, दुष्टता के साथ, पशुता के साथ, परेशानी का घर होना सिद्घ हो गया और परेशानियों को मानव वरता नहीं है । इस स्थिति में पुन: विचार करने के लिए आवश्यकता का अनुभव करता है। जब बल के आधार पर मांसाहार विधि मानव कुल के लिए व्यवस्था का आधार नहीं हुई है, तब और कौन सा आधार है कि मांसाहार विधि को वैध मानें। केवल शाकाहारी पद्धति भी व्यवस्था का आधार नहीं हो पाया तब मानव संचेतना ही एकमात्र शरण है जो मानवत्व है।
शरीर रचना, रचनाओं की विनियोजन प्रक्रिया और प्रयोजन को पहले इंगित कराया गया है। वनस्पति जगत की रचनाएँ धरती के लिए पूरक हैं। जबकि जीव शरीर और मानव शरीर भी धरती के लिए पूरक हैं। जीव शरीरों में जीवन ही अथवा जीवन की अभिव्यक्ति ही, जीवों और वनस्पतियों को अलग-अलग रूप और पहचान को स्पष्ट कर देता है। इस क्रम में, जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में ही, जीवों और मानव का वर्तमान होना स्पष्ट है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में रहते मानव ही सभी प्रकार से आंकलन करेगा। इस आंकलन क्रम में जीवों के शरीर में जब समृद्घ मेधस की रचना होती है (या हो जाती है) उस स्थिति में ऐसे शरीर को जीवन संचालित करता है। ऐसे शरीर में ही सप्त धातुओं के क्रियाकलाप, एक दूसरे के तालमेल के सहित संपन्न हुआ देखने को मिलता है। सप्त धातुएँ है- 1. रस, 2. मांस, 3. मज्जा, 4. रक्त,