(7) व्यवस्था के लिए उन्माद अनावश्यक, मद्यपान के लिए कल्पित आधार तर्क की निरर्थकता:-
उन्मादों में से एक लाभोन्माद है, यह निश्चित हो चुका है - ऐसा माना जा रहा है। सभ्यता और शिष्टता को बनाये रखने के क्रम में, किसी प्रकार का उन्माद सहायक नहीं हो पाता। मूलत: व्यवस्था के लिए उन्माद, उपयोगी नहीं हैं। इन उन्मादों के क्रम में ही सुरापान भी एक है अथवा अधिक उन्मादित होने का उपाय है। उन्माद को आदमी मानता तो नहीं किंतु उन्मादित होने का प्रयास सदा सदा ही मानव करता ही आया है। मुख्यत: मद्यपान के संबंध में, पक्ष-विपक्ष में चर्चाएँ मानव करते ही आया है। आचरण में अधिकांश लोगों में ऐसी आदतें देखने को मिलती हैं। शराब पीने वाले आदमी में से अधिकांश लोग, जो शराब नहीं पीते उनसे विकसित सभ्यता मान लेते हैं। यह भी सुनने को मिलता है कि जो शराब नहीं पीते वे पिछड़े हुए विचार के हैं। ये आगे-पीछे विचार वाली बात, एक ऐसी स्थिति है कि बीच में कोई आधार न होने के कारण, आगे वाले को पीछे वाले को, पहचाना नहीं जा सका है। फिर भी आज की स्थिति में बहुत सारी जिंदगी महंगी शराब, चमकती हुई गाड़ी, विभिन्न प्रकार के नाच-गाने में अपने को लगाये रखते है और चमकता हुआ घर, कपड़ा इन्हीं को बेहतरीन जिंदगी कह लेते हैं। जबकि इनमें कोई बेहतरीन वस्तु रहती नहीं छुपी हुई अपराध का प्रदर्शन है। क्योंकि बेहतरीन पैमाने को पाने के लिए तीन स्रोत:-
1. अखण्ड समाज में भागीदारी,
2. सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी,
3. मानवीयता पूर्ण आचरण में, पहचाना जा सकता है।
न कि प्रचलित कामोन्माद, लाभोन्माद एवं भोगोन्माद के आधार पर बेहतरीन जिंदगी को आदमी में देखा जा सकता है। अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था अभी तक प्रस्तावित, स्थापित नहीं हुई है, जिसमें मूल रूप में परम दर्शन, ज्ञान और आचरण प्रमाणित हो सके। व्यक्तियों के स्तर पर (इसलिए) इस बात को चर्चा में लाना संभव हुआ कि कितने भी हमारे समुदायों में लोग विविध प्रकार से भ्रमित हुए है, उन सबके निराकरण विधियों के क्रम में उन्माद और उनके सहायक और उनको तेज बनाने वाले कार्य के रूप में नशाखोरी है। इनमें से कुछ लोग कहते है, हमारा पैसा है, हम पीते है, तुमको क्या दर्द है। लोग कुछ ऐसा भी पूछते है, एक आदमी शराब पिया है, शान्त बैठा है, एक आदमी शराब नहीं पिया है वह भी शान्त बैठा है। इन दोनों में क्या अंतर है? पहले वाला जो अपने पैसे से शराब पीना कहता है, वह जो बात है, रेल में, मोटर में, घर में, शराब पीने के बाद जिस तिस से संभावित व्यर्थ विलाप करता है। उन शराबी के साथ वार्तालाप करना, एक निरर्थकता अथवा कटुता का जन्म होता है। जो सिगरेट, बीड़ी, गांजा, शराब आदि बदबूदार नशे से नशा किया हुआ व्यक्ति भी नशे की हालत में भी नशे के लिए अस्वीकृति उसमें रहती ही