वस्तु स्थिति सत्य “दिशा, काल, देश” के रूप में स्पष्ट है। परस्परता में दिशा है। इकाई में अनंत कोण हैं। हर वस्तु देश के रूप में उसी के रचना के समान होता है। क्रिया की अवधि, काल के रूप में, अस्तित्व में ही मानवकृत गणना है।
वस्तुगत सत्य प्रत्येक एक में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सहित द़ृष्टव्य हैं।
रूप के आधार पर परस्परतायें नियंत्रित रहना परमाणु, अणु, अणु रचित पिंडों में देखने को मिलता है। रूप और गुण के आधार पर संपूर्ण प्राणावस्था की कोषा और कोषाओं से रचित सभी रचनाएँ नियंत्रित रहना स्पष्ट हैं। जीवावस्था के रूप, गुण, स्वभाव के आधार पर नियंत्रित रहना देखने को मिलता है। इसी आधार पर मानव का रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के आधार पर नियंत्रित होना समीचीन है।
प्रतिबिम्बन, सहजता से प्रकाशमानता है और इसमें प्रकाश समाया रहता है, जो अनुबिम्बन और प्रतिबिम्बन में वैभव है। वस्तुत: परस्पर सम्मुखता ही है, प्रतिबिम्बन होना और पहचानना। अस्तु, प्रत्येक वस्तु अपनी संपूर्णता के साथ व्यक्त रहता ही है। प्रतिबिम्बन परस्पर भास होने के लिए अति आवश्यकीय तत्व है। प्रतिबिम्बन मध्यस्थ स्थिति का ही द्योतक है। धरती मध्यस्थ स्थिति में है, संपूर्णता के साथ है। इसका प्रतिबिम्बन सभी ओर होता है। इसी प्रकार धरती में जितनी वस्तुऐं हैं सभी अपनी संपूर्णता के साथ प्रतिबिम्बित रहती ही हैं। सूर्य, सौरव्यूह, अनंत सौर व्यूह एक दूसरे पर प्रतिबिम्बित रहते हैं। इस प्रकार प्रतिबिम्बन, परस्पर प्रकाशमानता और प्रकाश का ही स्वरुप है। अस्तु, प्रकाशन और प्रतिबिम्बन, गति या दबाव नहीं है। यद्यपि प्रत्येक वस्तु में निहित गुणों का परार्तवन होना पाया जाता है। जैसे- ऊष्मा, चुम्बकीयता, विद्युत, भार ये सब एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। प्रभाव क्षेत्र भी इन्हीं का वैभव है।
इसी आधार पर ऊष्मा, चुम्बकीयता व विद्युत प्रभाव परावर्तित होती है। तप्त बिम्ब की स्वभाव गति, जो विकास क्रम के अनुसार स्पष्ट हो चुकी है। ऐसी स्थिति स्थापित होने के लिए संपूर्ण वातावरण, धरती सहित अनेक कम ताप वाले ग्रह गोल सूर्य से परावर्तित अधिक ताप को आबंटित कर लेते हैं। फलस्वरुप सूर्य का पूरकता विधि से अधिक ताप से मुक्त होने की संभावना भी बनी रहती है।
ताप मूलत: किसी इकाई के आवेश के समान होता है। कोई ग्रह-गोल में अंत: आवेश जितना अधिक होता है, उतना ही न्यून और न्यूनतम संख्यात्मक अंशों के परमाणु प्रजाति के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसी क्रम में परम तप्त बिम्ब के रूप में जो सूर्य है, उसमें जितनी भी वस्तुएँ है, वह सब न्यून संख्यात्मक परमाणु प्रजाति के रूप में ही अवस्थित हैं। जैसे-जैसे सूर्य ठंडा होता जायेगा, उसी में पूरक नियम के