अनुसार अनेक संख्यात्मक प्रजाति के परमाणु स्थापित हो जाएँगे। इस प्रकार सूर्य में ऊष्मा का परावर्तन बिम्ब का प्रतिबिम्बन स्पष्ट हो जाता है।
(2) बिम्ब का प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब होता है :-
हर वस्तु का प्रतिबिम्बित होना और प्रकाशित रहना, सहज सत्य है। ऐसी प्रतिबिम्बन क्रियाओं में तप्त परम बिम्ब का प्रतिबिम्बन भी होता है। उसी के साथ अनुबिम्बन, प्रत्यानुबिम्बन होता है। जिसके ऊपर जिसका प्रतिबिम्ब पड़ा रहता है, वह वस्तु भी प्रतिबिम्बित होने वाली है। इस आधार पर अनुबिम्ब विधि स्पष्ट होती है। जो कुछ भी प्रतिबिम्बित है, वह प्रत्येक, जो जो प्रतिबिम्बन है, उसके समुच्चय सहित ही उसका अनुबिम्ब, प्रति अनुबिम्ब होना पाया जाता है।
इसे ऐसा भी समझ सकते है कि किसी एक व्यक्ति के ऊपर चार व्यक्तियों का प्रतिबिम्ब पड़ा हो, उसका प्रतिबिम्बन, उन सभी प्रतिबिम्ब में समेत होता है। पहले से जिसका प्रतिबिम्ब रहा है, वे सब अनुबिम्ब में गण्य होते हैं। अनुबिम्ब जिस पर आता है, उस पर प्रतिबिम्ब भी रहता है। इसी प्रकार प्रत्यानुबिम्ब होता है। इस विधि से प्रत्येक अपारदर्शक वस्तु की परछाई स्वयं, तप्त बिम्ब का प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब विधि से, शनैः शनैः परछाई की लबाई छोटी होती जाती है। परछाई की लंबाई जहाँ समाप्त होती है, उसकी परछाई दिखाई नहीं पड़ती है।
इस प्रकार से, प्रकाश के टेढ़ी होने की परिकल्पना की जा सकती है, जबकि सत्य ऐसा नहीं है। सत्यता यही है कि अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब विधि से प्रकाशन, परछाई के सभी ओर निहित रहती है। विरल अणुओं पर अनुबिम्ब, प्रत्यानुंबिंब विधि से फैलने के आधार पर परछाई प्रकाश में ही छुप जाती है। ये तप्त परम बिम्ब का, प्रकाशन विधि क्रम है। कम या सामान्य ताप बिम्ब का प्रतिबिम्ब भी स्वाभाविक रूप में परस्परता में रहता ही है।
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