विकास होता है । ऐसे विकसित परमाणु गठनपूर्ण होते हैं, यही चैतन्य इकाई है, यही जीवन है। जीवन ही शरीर को जीवंत बनाये रखते हुए समझदारी को प्रमाणित करता है ।
3. परमाणु में विकास
इससे पहले रचनाओं में विकासक्रम स्पष्ट हुआ है । यह विकासक्रम परमाणु, अणु, अणुरचित पिण्ड, वनस्पति संसार, पशु-शरीर, मानव-शरीर की रचना तक, रचना में विकास क्रम को स्पष्ट किये है । मानव शरीर सर्वोच्च विकसित रचना के रूप में अध्ययन गम्य है ।
मानव शरीर सर्वोच्च विकसित रचना इसलिये है कि मानव शरीर में मेधस रचना पूर्णतया विकसित हो चुकी है । सुदूर विगत से ही मानव न्याय, धर्म, सत्य संबधी तथ्यों का उद्घाटित करने का इच्छुक रहा है । इस क्रम में जितने भी प्रयोग हुए हैं और आगे भी सूझ-बूझ को विकसित करने की आवश्यकता बनी रही । प्रयासों के क्रम में आदर्शवादी, भौतिकवादी सूझबूझ प्रयोग में आई। फल-परिणाम मानव कुल में आंकलित हो चुका है ।
न्याय की अपेक्षा आज भी सर्वाधिक मानव में बनी हुई है ।
उक्त क्रम में अस्तित्व को सहअस्तित्व के रूप में समझने के लिए, अभिव्यक्त करने के लिए प्रयास प्रस्तुत है । अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व होने के आधार पर रचनाओं में विकासक्रम स्पष्ट हुआ । हर रचनाओं के मूल में परमाणु होना स्पष्ट है । परमाणुओं में विकासक्रम होना, विकास होना भी समझ में आता है ।
परमाणु में विकास का तात्पर्य परमाणु के गठनपूर्ण होने से है । मानव में एक बात की चाहत बनी ही है - यथास्थिति, वैभव, उसकी निरंतरता - यह स्वाभाविक रूप में स्वीकृत है । परमाणुओं में अंशों का घटना-बढ़ना, परिणाम के स्वरूप में हम समझ चुके हैं । परिणाम का अमरत्व, उसकी निरंतरता की अपेक्षा मानव में ही कल्पना, भास, आभास, प्रतीति के रूप में पाया जाता है । इसके लिए बहुत सारे प्रयास होना भी स्वाभाविक है । सहअस्तित्ववादी विधि से यह स्पष्ट हो गया है कि विकास क्रम में अनेक रचनायें, स्थिति-परिस्थितियाँ दृष्टिगोचर हो चुकी है । इसके मूल में परमाणु ही कार्यरत रहना स्पष्ट हो चुका है । ऐसा परिणामरत परमाणु ही गठन तृप्त पद में घटित हो जाता है । इस घटना के लिए स्वाभाविक क्रिया परिणाम विधि ही है ।