उक्त विधि से यह सुस्पष्ट हो गया है कि भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया के मूल में परमाणु ही है । जीवन परमाणु गठनपूर्ण है और भौतिक, रासायनिक क्रिया में भागीदारी करते हुए परमाणु गठनशील है । गठनशीलता विधि से भार बंधन, अणु बंधन होना पाया जाता है । वहीं जीवन परमाणु भार बंधन, अणु बंधन से मुक्त रहना पाया जाता है । इसका प्रमाण हर मानव में निहित आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रमाणों को भौतिकीय तुला पर आंकलन और संख्याकरण न कर पाना ही है । भौतिकीय तुला एक उपाय है भार को पहचानने का । इस गवाही से यह स्पष्ट है कि भौतिक परमाणु ही विकासक्रम में गुजरते हुए, गठनपूर्ण पद में संक्रमण घटना सम्पन्न होना मानव को समझ में आता है । दूसरे विधि से परमाणु ही गठनशील पद में जड़ और गठनपूर्ण पद में चैतन्य है । विकासक्रम के बिना विकास का अध्ययन ही नहीं होता । चैतन्य परमाणु, (जीवन ही) परम्परा के रूप में, विकास, विकसित पद, जागृति क्रम, जागृति को अध्ययन व प्रमाणित करता हुआ पाया जाता है । इस तथ्य के आधार पर मानव परम्परा में ही जागृति प्रमाणित होने की व्यवस्था है अर्थात् जागृतिपूर्वक ही मानव परम्परा वैभवित होने की व्यवस्था नियति विधि से बनी हुई है । नियति विधि का तात्पर्य सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व वैभव विधि, प्रक्रिया, फल, परिणाम, उसकी निरंतरता से है ।

परमाणु में विकास, गठनपूर्ण पद में अथवा गठनपूर्ण परमाणु के रूप में है । मानव ‘है’ का अध्ययन करता है । अध्ययन का तात्पर्य अनुभव के प्रकाश में स्मरण पूर्वक अर्थों से इंगित वस्तुओं का, अस्तित्व में पहचान पाना है । इस प्रकार शब्दों का स्मरण, शब्दों के अर्थ से इंगित वस्तुएं अस्तित्व में सुपष्ट होना ही जागृति है । सुस्पष्टता का तात्पर्य स्वयं में अनुभव, कार्य-व्यवहार में प्रमाण होना ही है ।

परमाणु में विकास का मतलब यह स्पष्ट हुआ कि परमाणु गठनपूर्ण पद में होना और गठनपूर्ण परमाणु जागृत होना, यही नियति है । यह मानव परंपरा में ही प्रमाणित होता है । इसको मानव परम्परा में व्यक्त करने योग्य शरीर रचना पहले से बन चुकी है । इस शरीर के द्वारा अपनी जागृति को प्रमाणित करने के लिए मानव ने भाँति-भाँति के प्रयोग किये । परन्तु, परमाणु में विकास का आशय गठनपूर्ण परमाणु है, ऐसा परम्परा में व्याख्यायित न हो पाने के आधार पर जीवन पद का अध्ययन नहीं हो पाया । जीवन में घटित होने वाली जागृति के प्रकाश में ही जीवन पद का अध्ययन होना पाया जाता है । इसलिये इसका जिक्र यहाँ करना स्वाभाविक रहा ।

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