समूह सभा। पाँचवाँ - क्षेत्र सभा। छठा - मंडल सभा। सातवाँ - मण्डल समूह सभा। आठवाँ - मुख्य राज्य सभा। नवमा - प्रधान राज्य सभा। दसवाँ - विश्व परिवार स्वराज्य सभा। इस विधि से निर्वाचन कार्य में धन या वस्तु लगने की आशंका समाप्त हो जाती है। धन या वस्तु के साथ निर्वाचन कार्य को जोड़ना स्वयं निर्वाचन कार्य की पवित्रता का हनन सिद्घ हुआ हैं। इसका साक्ष्य मानव को मिल चुका हैं।
परिवार मूलक स्वराज्य, समझदारी मूलक स्वायत्त मानव परिवार है। समझदारी की संपूर्णता ही जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन एवम् मानवीयतापूर्ण आचरण है। व्यवस्था के क्रियान्वयन करने के मूल में, प्रत्येक परिवार को जीवन विद्या में पारंगत बनाने की व्यवस्था रहेगी। भ.व. (180 -183)
3.3.2 परंपरा जागृत होने की आवश्यकता
मानव परंपरा तब तक भ्रमित रहना भावी है जब तक समुदाय और समुदायगत आवश्यकता की हठधर्मिता, सुविधा संग्रह की हठधर्मिता, भोग-अतिभोगवादी हठधर्मिता, आदमी को मूलत: दुखी मानने वाली हठधर्मिता, स्वार्थी, अज्ञानी और पापी मानने वाली हठधर्मिता, कोई एक समुदाय अपने को धर्मी अन्य को विधर्मी मानने की हठधर्मिता, द्रोह-विद्रोह-शोषण और युद्ध को एक आवश्यकता मानने वाली हठधर्मिता, व्यक्तिवादी (अहमतावादी) मानसिकता के लिये सभी हठधर्मिता रहेगी।
इसका निराकरण जागृति ही है। जागृति पूर्ण परंपरा मे ही अर्थात् जागृत शिक्षा-संस्कार, जागृत न्याय व्यवस्था और जागृत उत्पादन कार्य-व्यवस्था, जागृत लाभ-हानि मुक्त विनिमय व्यवस्था और जागृत स्वास्थ्य संयम पीढ़ी से पीढ़ी को सुलभ होने से है।
ऐसी जागृत पूर्ण परंपरा में पीढ़ी से पीढ़ी जागृत होते ही रहना एक अक्षुण्ण परंपरा है। ऐसी परंपरा में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सर्वसुलभ होने की कार्यप्रणाली, पद्धति, नीति क्रियाशील रहेगी फलत: विविध प्रकार से समुदायों को अपनाया हुआ भ्रम अपने आप विलय होना स्वाभाविक है। यह अनुभव मूलक जीने के क्रम में पाया जाने वाला वैभव है। उक्त उदाहरण के क्रम में ही जागृत परंपरा में प्रवाहित मानव परंपरा के महिमावश सम्पूर्ण हठधर्मिताएँ विलय हो जाते हैं। जैसे-सही गणितीय ज्ञान के उपरान्त गणित में होने वाली कोई गलतियां शेष नहीं रहती हैं, इसी प्रकार जागृति सहज रूप में जीने के क्रम में सम्पूर्ण भ्रम विलय होता है। जैसा-संग्रह सुविधा रूपी हठधर्मिता और विवशताएँ समृद्धि पूर्ण होने के साथ-साथ विलय होना देखा गया है।
हठधर्मिता जो व्यक्तिवादी (अहमतावादी) मानसिकता के लिये जिम्मेदार है उसके मूल में समाज विरोधी सूत्र सदा ही पनपते आई है।
क्योंकि समाज, व्यवस्था और समग्र व्यवस्था जो अस्तित्व सहज है, इसे स्पष्टतया समझने के स्थिति में हम यह पाते हैं कि यह अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व सूत्र ही है। सह-अस्तित्व सूत्र के आधार पर ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था हमें विदित हुआ है। इस तथ्य के आधार पर मानव जब तक जागृतिपूर्ण होता है तब तक भले ही ऊपर कहे