वस्तु का प्रतीक धातु हुआ, धातु का प्रतीक पत्र हुआ जैसे – गेहूं के लिए पहले चांदी का सिक्का और चांदी के सिक्के के लिए पैसा। इस बीच चर्म मुद्रा भी प्रचलित होने की बात सुनने में आती है। इस प्रकार अब आधुनिक युग के अनुसार अर्थशास्त्र केवल अर्थ (धन) के अध्ययन के रूप में उभरी। अर्थ का अध्ययन वस्तु के प्रतीकात्मक मूल धातु, उसके संग्रहण, उसके तादात पर आधारित पत्र मुद्रा, पत्र मुद्राओं पर आधारित अथवा पत्र मुद्रा रूपी मूल्यों के आधार पर मूल्यांकित वस्तुओं का स्वरूप बन गई। इन सभी प्रयास में लाभ ही प्रधान तत्व हुआ।

लाभ का स्वरूप सदा ही, जब से मानव में लाभ का आशा शुरू हुआ तब से, कम देकर अधिक पाना प्रवृत्ति रहा है। कितना कम देकर कितना अधिक पावे इसका ध्रुव अभी तक प्रचलित अर्थशास्त्रों के आधार पर प्रचलित नहीं हो पायी।

अभी तक लाभ का संतुष्टि बिन्दु कहीं, किसी देश काल में नहीं मिल पायी है। इस प्रकार अंतविहिन लाभ प्रक्रिया अथवा लाभ मानसिकता सहित सभी व्यापार विद्वान होना पाया जाता है। इससे और भी एक आकलन निष्पन्न होती है कि वस्तुओं का उत्पादन करने वाला सदैव ही गरीब रहना देखा गया। अ.श. (12-13)

वर्तमान में जो कुछ भी अर्थव्यवस्था के नाम से स्वीकार किए है – संग्रह में, संग्रह से, संग्रह के लिए क्रियाशील होता हुआ देखने को मिलता है। अ. श. (92)

सभी वस्तुएं मुद्रा (नोट, पैसा) में बिका करते हैं और वस्तुएं मुद्रा के अधीन हैं। किंवा मानव का श्रम भी मुद्रा के अधीन है। इसीलिए मुद्रा का संग्रहण मानव के हैसियत को पहचानने का प्रधान आधार बन गया। इसी के साथ-साथ मुद्रा से बल और बलवान को, विद्या और विद्वान को, ज्ञान और ज्ञानवान को, पद और पदवान को, रूप और रूपवान को खरीदा जा सका है। इन पाँच में से ज्ञान और ज्ञानवान को खरीदने के-बेचने के संबंध में अभी भी वाद-विवाद के रूप में हिचकिचाते हैं। यथास्थिति के अनुसार निरीक्षण-परीक्षण करने पर पता लगता है इन पाँचों का व्यापार और व्यापार संस्थान बन चुका है। योग और ज्ञान, सम्मोहन कार्यक्रमों के आधार पर ज्ञान व्यापार को देखा जाता है। बाकी चारों के पक्ष में जो व्यापार कार्य है वह सर्वविदित है।

व्यापार का मूल उद्देश्य लाभोन्माद ही है। कम देना-ज्यादा लेना मुद्रा के रूप में एवं वस्तु के रूप में भी। कुछ भी नहीं देना, आश्वासनों के आधार पर ही वस्तु और मुद्रा को एकत्रित कर लेना ही दुष्टतम ज्ञान व्यापार है। संसार को बुद्धू बनाने की कला इसमें समाहित रहती है। अ.श. (94-95)

  • व्यापार विधि से समाज नहीं बन सकता।
  • व्यापार विधि से समुदायों में अन्तर्विरोध मिट नहीं सकता।
  • व्यापार विधि से बैर विहिन परिवार हो नहीं सकते, समझौते में भले ही सांत्वना पाते रहे।
  • व्यापार विधि से “धर्म” सफल नहीं हो सकता।
  • व्यापार विधि से कोई राष्ट्र राज्य-व्यवस्था सार्वभौम, अखंड और अक्षुण्ण नहीं हो सकती।

व्यापार विधि से कोई भी व्यक्ति समृद्ध नहीं हो सकता (मात्र संग्रह कर सकता है)। क्योकि संग्रह सुविधा और लाभ का तृप्ति बिन्दु नहीं होता।

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