- व्यापार विधि से सार्वभौम शुभ (समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व) घटित नहीं हो सकता।
इन निष्कर्षों के साथ ही विकल्प की ओर दृष्टिपात करना एक आवश्यकता है। विकल्प के रूप में, लाभ- हानी मुक्त विनिमय श्रम मूल्य के आधार पर प्रस्तावित है। यह न्यायिक है।
न्याय सुरक्षा
परिभाषा :- संबंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन, उभय तृप्ति ही “न्याय” है। अर्थात “सुरक्षा” अलग कार्यक्रम नही है। न्याय होने से सुरक्षा अपने आप होता है। न्याय पूर्वक जीते है तो सुख अपने आप होता है। अ.श.(17)
मानव के जागृति क्रम विधि से पारिवारिक और सामूहिक रूप में किये गये कृत्यों के आधार पर पीड़ा बलवती होने का स्वरूप को स्पष्ट किया गया। इसी से व्यवहारिक रूप में भ्रम और बन्धन परस्पर मानव के बीच में द्वेष के रूप में, परिवार-परिवार एवं समुदाय-समुदाय के बीच में वैचारिक मतभेद, ईर्ष्या, द्वेष, भय, संघर्ष के रूप में होना देखा गया। मानसिकता के रूप में अर्थात् आशा, विचार, इच्छा के रूप में व्यक्तिवादी अहमताएँ श्रेष्ठता, संग्रह, भोग के आधार पर गण्य हुई।
जीवन अपने क्रिया के रूप में आस्वादन, विश्लेषण से अधिकाधिक चित्रण क्रिया को सम्पादित किया।
सम्पूर्ण चित्रण इसी धरती के वस्तुओं को उपयोग करते हुए प्रमाणित करने की विधि तैयार हुई। इस प्रकार से धरती के वस्तुओं को सर्वाधिक दोहन करने के फलस्वरूप धरती का ही संतुलन, भाँति-भाँति विधि से खंडित होना आंकलित हुआ। यही सर्वाधिक पीड़ा का आधार हुआ। अभी भी बुद्धिजीवी और विज्ञानियों में से बुद्धिजीवी अपने बुद्धिवादिता के आधार पर धरती और धरती के वातावरण के असंतुलन में अपनी भागीदारी को कम स्वीकारते हैं। दूसरी ओर विज्ञान और प्रौद्योगिकी संसार में भागीदारी करता हुआ विज्ञानी, मनीषीयों में अपने को धरती के असंतुलन में प्रधान कारक तत्व होने की स्थिति को कम लोग स्वीकारते हैं। इस मुद्दे पर पीड़ित लोगों की संख्या अभी भी न्यूनतम ही है। फिर भी पीड़ित लोगो का संख्या बढ़ रही है।
तात्विक रूप में अर्थात् जीवन अपने तत्व रूप में न्याय दृष्टि की क्रियाशीलता के लिए एक तड़प अथवा प्यास उत्पन्न हो चुकी है।
विगत 50 वर्ष से शैशवकालीन मानसिकता में जन्म से ही न्याय का अपेक्षा बना रहना सर्वेक्षित हुआ। कुछ समाज सेवी संस्था भी न्याय के नाम से अपेक्षाओं को व्यक्त करते ही है। इस दशक तक न्यायालयों में न्याय का स्वरूप स्पष्ट नहीं है। लोक मानसिकता में न्याय सहज अपेक्षा बढ़ता हुआ देखने को मिलता है। प्रिय, हित, लाभ दृष्टियों से अभी तक किये गये क्रिया-कलापों से अधिकांश पराभव, विरक्ति ही हाथ लगा है। यहाँ विरक्ति का तात्पर्य किया गया का व्यर्थता को स्वीकारने से है। यह जीवन क्रिया सहज जागृति क्रम का एक सूत्र है। अ.व. (132-134)