जबकि बच्चों में यह देखा गया है, शिशु, कौमार्य सहज सौंदर्य उनमें रहता ही है, साथ ही सामने आयु वर्ग के आदमी रहे हों, दादाजी, अंकल, चाचाजी और भाई कहने योग्य हों, ऐसे संबोधन के प्रभाव में व्यक्ति पर अपना-पराया का प्रभाव, ऐसे बच्चों के बीच में बाधा नहीं डालता, निष्प्रभावी हो जाता है। दूसरी जो स्थिति बताई गई उसमें परस्पर आगन्तुकता युवा, प्रौढ और वृद्घ की हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में यह देखने को मिलता हैं कि अपने-पराए के आधार पर ही संबोधन की स्वागत कराने के बीच में अवरोध पैदा कर देता है इसलिए कुछ लोग स्वागत कर पाते हैं, कुछ लोग आंशिक रूप में स्वागत करते हैं, तो कुछ लोग बिल्कुल भी स्वागत नहीं करते। इन तीनों स्थितियों को इस प्रकार परंपरा के भ्रमवश, परंपरा से आई हुई मान्यताओं के साथ अपना पराया होता ही है। प्रचलन में न्याय व्यवस्था भी इसी कठघरे में गिरफ्त है। भ. व. (179-180)

अभी न्यायालय में न्याय की पहचान नहीं हो पायी है। अभी तक न्यायालय में फैसले का सिलसिला चल रहा है वह भी गवाहियो के आधार पर ना कि घटना के आधार पर। न्याय के पक्ष में निर्णय के साथ सुधार का कोई कार्यक्रम नहीं रहा। अपराधी को न्यायिक बनाने की कोई व्यवस्था नहीं है। गलती करने वालो को सही करने की दिशा देने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके मूल में सभी मानव यदि समझदार होते है तो गलती और अपराध करेगें ही नहीं, गलती अपराध मुक्त होना ही समाधान सम्पन्नता है। समाधान सम्पन्न मानसिकता से हर व्यक्ति परस्परता मे न्याय ही करता है अन्याय कर ही नहीं सकता। सभी मानव अपने में से न्यायिक होने के उपरान्त अन्याय का खतरा ही कहां है ?

सारे अपराध, अन्याय और गलतियाँ मानव के नासमझी की उपज है। समझदारी के उपरान्त मानव का आचरण निर्धारित हो जाता है ध्रुव बिन्दु यही है।

जब आचरण निश्चित, स्थिर, निरन्तर प्रभावशील होने लगता है तब भरोसा, विश्वास और सुन्दर कार्यक्रम उदयशील होते है यही समझदार व्यक्ति की महिमा है। समझदार मानव अपने में आश्वस्त रहकर विश्वास पूर्ण विधि से कार्य करने में समर्थ होता है। गलती, अन्याय मुक्ति के लिए हर नर नारी में स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता का सम्मान, प्रतिभा (समझदारी) और व्यक्तित्व (आहार, विहार, व्यवहार) में सन्तुलन, व्यवसाय (उत्पादन) में स्वावलम्बन, व्यवहार मे सामाजिक अर्थात अखंड समाज में भागीदारी होना आवश्यकता है। यह मानव वैभव का मूल स्वरूप है। यह समझदारी का भी फलन है। पद, पैसा, सम्मान पर विश्वास किया जाए अथवा इन छ: महिमा में विश्वास किया जाए। इस पर जनचर्चा, विश्लेषण, निष्कर्ष की आवश्यकता है ही। ज. व. (159)

अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था – निष्कर्ष

जैसे, हिन्दू धर्म, सिक्ख धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, पारसी धर्म, यूनानी धर्म, हरिजन धर्म, आदिवासी धर्म आदि और इसी प्रकार बहुत से धर्मों को गिनाया गया है। बहुत सारे धर्मों के आधार पर समुदाय चेतना देखने को मिलती है। किसी एक समुदाय के आधार पर, मान्यता भले ही रुढ़ि के रूप में क्यों न हो, ऐसा होने के बाद स्वाभाविक रूप में उनके लिए बाकी सभी पराए हो ही जाते हैं। इस प्रकार अपने-पराए का चक्कर सभी व्यक्तियों के साथ प्रकारान्तर से चला है अथवा सर्वाधिक व्यक्तियों के साथ यह चक्कर लगा हुआ है। ‘समाज’ मानव समाज ही होता है। “मानवत्व” मानव चेतना सम्पन्न परंपरा ही धर्म और राज्य का आधार होता है। समाज परंपरा में व्यवस्था होती है।

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