सामान्य आकांक्षा संबंधी वस्तुओं को पाने के लिये धरती को तंग करने की आवश्यकता उत्पन्न ही नहीं होता क्योंकि धरती के पेट में आहार, आवास, अलंकार संबंधी वस्तुएँ न्यूनतम है और ये वस्तुएँ धरती के ऊपरी सतह से ही प्राप्त हो जाती है।
आहार के लिये कृषि, अलंकार के लिये भी कृषि और वन्य उपज पर्याप्त होता है। आवास के लिये भी धरती की ऊपरी सतह में मिलने वाले द्रव्यों से सुखद आवास स्थली को पाया जा सकता है। मानसिकता जागृत और भ्रमित का द्योतक है। मानव ही जागृत अथवा भ्रमित मानसिकता के आधार पर ही कार्य-व्यवहारों को निश्चय करता है। भ्रमित मानसिकता विधि से ही भय, प्रलोभन, स्वर्गाकांक्षा और उपभोक्ता विधि ही मानव के पल्ले पड़ता है और पड़ा ही है। जागृति सहज विधि से आवश्यकताएँ समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्वपूर्ण विधि से जीने की कला है। व्य.श. (88-90)
अतः उत्पादन को इस प्रकार से समज सकते है:-
- प्राकृतिक ऐश्वर्य पर कार्य (श्रम) नियोजनपूर्वक उपयोगिता व कला मूल्यों की स्थापना सहित सामान्य आकाँक्षा और महत्वाकाँक्षा के रूप में वस्तुओं को रूप प्रदान करने की क्रिया।
- मानव द्वारा मानवेत्तर प्रकृति पर उपयोगिता एवं सुन्दरता की स्थापना किया जाना।
- उपयोगिता मूल्य एवं उत्थान की दिशा में तन, मन और प्राकृतिक ऐश्वर्य में किया गया गुणात्मक परिवर्तन। अ.श. (242)
आवश्यकता निश्चित है, साधन पर्याप्त है
सम्पूर्ण आवश्यकताएँ शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति में ही उपयोगी, सदुपयोगी, प्रयोजनशील है। इसी स्पष्ट नजरिये से जीवन ज्ञान सम्पन्न हर मानव को आवश्यकताएँ सीमित दिखाई पड़ती हैं और आवश्यकता के अनुरूप उत्पादन श्रम शक्ति मूलत: जीवन शक्ति की ही अक्षय महिमा होने के आधार पर आवश्यकता से अधिक उत्पादन में विश्वास स्वाभाविक है। यह स्वायत्त मानव में अभिव्यक्त होने वाले आयामों में से उत्पादन-कार्य भी एक आयाम है। इस विधि से शरीर के पोषण, संरक्षण, सदुपयोग तथा समाज गति के अर्थ में आवश्यकताएँ सीमित संयत होना पाया जाता है। इसी सूत्र के आधार पर अपने उत्पादन कार्यों को विभिन्न वस्तुओं के रूप में परिणित करने में निष्ठान्वित होते हैं। अ.श. (238)
समृद्धि का आधार सूत्र:- मनुष्य में श्रम नियोजन की क्षमता, सदा ही बनी रहती है। जीवन शक्तियाँ अक्षय है, इस कारण मानव आवश्यकता से साधिक वस्तुओं को निर्मित करने का अधिकार सम्पन्न है ही। मानव में अक्षय बाल और अक्षय शक्ति को पहचाना जाता है, यही सूत्र मानव के समृद्धि होने का आधार है। भ. व. (281-284)
हम मानव इन सब वस्तुओ को सुखी होने के लिए पाना चाहता है। किन्तु एक व्यक्ति जितना संग्रह कर लेता है उतना सब के पास नहीं होता है। यह भी जनचर्चा का एक मुद्दा है। ये सारी सुविधाएँ सबको कैसे मिल सकती है ? क्या