हुए वितण्डावाद रहे आये। जैसे ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था परंपरा में प्रमाणित होते है, व्यक्तिवादी अहमताएँ अपने आप ही विलय को प्राप्त करते हैं।

जागृति परम्परा की आवश्यकता इस दशक में बढ़ रही है, जो मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित करने के स्वरों के रूप में, सुनने को मिलता है।

कम से कम, इस दशक में मानवतावादी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देने वाली गोष्ठियां सभी स्तरों पर पाई जाती हैं। इसलिए मानव परम्परा जागृत होने की संभावना समीचीन होती है। जागृति के आधार पर मानव संचेतना सहज वर्तमान में सभी समुदाय चेतनाएं विलय होने की घटना की संभावना समीचीन हो चुकी है। क्योंकि आदर्शवाद और भौतिकवाद सदूर विगत से अभी तक जो कुछ भी समुदायों और वर्गों का संघर्ष मतभेद और शक्ति प्रयोग (संघर्ष और सामरिक विधि से) करता हुआ मानव तंत्र के परिणाम स्वरूप आज की स्थिति में प्रदूषण, बढ़ती हुई जनसंख्या, धरती का तापमान, बढ़ती हुई समुद्र की सतह, ये सब प्रधान संकट हैं। अ.व. (21-23)

इस प्रकार मानव कुल के द्वारा भ्रमवश किये हुए सभी भूलों का सुधार समाधान सहित व्यवस्था क्रम में हो सकता है। अस्तित्व सहज एवं मानव सहज व्यवस्था का अध्ययन ही मूलत: नैसर्गिक मानव की पारंपरिक व्यवस्था का सहज अध्ययन है, जो स्वयं जागृति का प्रमाण हैं। संर्पूण जागृति, सर्वतोमुखी समाधान, प्रामाणिकता और लोक न्याय के रूप में वैभवित हो पाते हैं। फलत: समृद्घि और अभय मानव में, से, के लिए सुलभ हो जाता हैं। सभी कार्यों के साथ मानव परंपरा का परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के रूप में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में वैभवित होना संभव हैं। जिसकी आवश्यकता सर्वमानव में पाई जाती हैं अथवा स्वीकृति सर्वमानव में पाई जाती हैं। इसलिए परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था कार्यक्रम को प्रमाणों के आधार पर अपनाना चाहिए।

परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था विधि से ही न्याय-सुलभता और लाभ-हानि मुक्त विनिमय सुलभता संभव हो जाती हैं। ऐसा संभव होने पर संग्रह के स्थान पर समृद्घ होना ही हैं।

प्रत्येक परिवार मानव आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने के क्रम में समृद्घि का अनुभव करता हैं। न्याय सुलभ होने से मानव वर्तमान में विश्वास करता ही हैं। फलत: सभी ओर समाधान नजर आता है। इसी सत्यतावश समृद्घि सहित परिवार मानव व्यवस्था के रूप में प्रमाणित हो जाता है। हर परिवार में आवश्यकता से अधिक उत्पादन होने के आधार पर प्रत्येक परिवार में शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति के अर्थ में निश्चित उत्पादन-कार्य विधिवत् निर्धारित रहना संभव हो जाता हैं। फलस्वरुप उत्पादन सुलभता का अनुभव होना सहज हैं।

इस प्रकार न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता सहज आवर्तनशील वैभव, स्वयं नित्य उत्सव के रूप में स्वराज्य व्यवस्था को प्रमाणित कर देता हैं। ऐसे उत्सव के अभिन्न अंगभूत मानवीय शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य संयम सहज कार्यक्रम मानव कुल में व्यवहृत होता ही रहेगा।

(इस अध्याय में मानव- मानव संबंध- परिवार – समाज व्यवस्था पर चर्चा रही अगले अध्याय में मानव प्रकृति संबंध, यथा नैसर्गिक संबंध पर चर्चा जारी ) भ. व. (337 – 338)

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