करना होगा? इसको निर्धारित करना भी एक मुद्दा है। मानव कुल शरीर पोषण, संरक्षण, समाज गति में तृप्त होने का इच्छुक रहा ही है। यही इच्छा पूर्ति नहीं हो पाई क्योंकि संग्रह और सुविधा के अर्थ में सारे वस्तुओ को मूल्यांकित करने की आदत मानव में समावेशित हो चुकी है। संग्रह, सुविधा का तृप्ति बिन्दु को पहचानने के पक्ष में परामर्श करने पर पता चलता है कि इन दोनों का तृप्ति बिन्दु मिलता नहीं।

मानव परम्परा के इतिहास के अनुसार सामान्य और महत्वाकांक्षा सम्बंधी वस्तुओं की उपलब्धि जैसे-जैसे हुई उससे तृप्त होने की इच्छा मानव में होती रही।

उसके बाद किसी वस्तु की कमी महसूस होती थी तो उसके मिलने से तृप्त हो जायेगें, सुखी हो जायेंगे ऐसा सोचते थे। संयोग वश आज सभी वस्तुएँ उपलब्ध हो गई, कई लोग प्राप्त भी कर लिये, इसके बावजूद सुखी होने का लक्षण कहीं उदय हुआ नहीं। इस आधार पर मानव का लक्ष्य क्या हो सकता है ? इस मुद्दे पर परामर्श पूर्वक सर्वेक्षण करने पर पता चलता है कि मानव सुविधा संग्रह, भोग, अतिभोग की ओर प्रवृतित होता देखा गया। यह भी तृप्ति विहीन प्रयोग साबित हुआ। इस क्रम में पुन: विचार की आवश्यकता हुई।

भ्रमवश हम मानव यही कहते रहे हैं कि आवश्यकता अनंत है साधन सीमित हैं। इसलिए संघर्ष करना जरूरी है।

छीना-झपटी, शोषण ही संघर्ष का रूप हुआ। ऐसे घृणित कार्य करते हुए भी श्रेष्ठता का दावा किया, बेहतरीन जिन्दगी का दावा किया। यह कहाँ तक न्याय हुआ ? इस मुद्दे पर भी जनचर्चा की आवश्यकता है। भ्रमित जन मानस में भी न्याय, धर्म, सत्य की अपेक्षा रूप में स्वीकृति बनी हुई है किन्तु उसी के साथ-साथ परम्परा में इसकी प्रामाणिकता की उपलब्धता नहीं रहने के कारण मानव अपने अपने तरीके से जीवों से अच्छा जीने के स्वरूप को बना लेता है।

जीने के क्रम में आहार, विहार, व्यवहार, उत्पादन, कार्य का निश्चयन आवश्यक है। प्रकारान्तर से मानव इसे अनुसरण किये रहता है।

समाधान के लिए समझदारी का होना अनिवार्य है। समझदारी के प्रयोग से हम समाधान पाते है। समाधान के उपरांत ही परिवारगत आवश्यता से अधिक उत्पादन करने का तौर तरीका सुलभ होता है, संभावना पहले से ही रहती है। समाधान के लिए समझदारी का होना अनिवार्य है। समझदारी के प्रयोग से ही हम समाधान पाते है। समाधान के उपरान्त ही परिवारगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने का तौर तरीका सुलभ होता है, सम्भावना पहले से ही रहती है। ज.व. (112-115)

इस ढंग से आवश्यकता मानवीयता में संयत होना पाया जाता है। इसी में अपव्यय का अभाव होता है। अपव्यय ही मानव जीवन में परम घातक प्रक्रिया है। इसके साक्ष्य में यह देखा जाता है कि एक व्यक्ति द्वारा किया गया अविष्कार अनेक से स्वीकार्य होता है, जबकि अनेक से किया गया अपराध एक को भी स्वीकार कराने में समर्थ नहीं रहा। वे स्वयं उसको अस्वीकार किए रहते हैं। अपव्यय एवं अपराध मानव की वांछित उपलब्धि नहीं है। यही सत्यता बाध्य करती है कि मानव मानवीयतापूर्ण जीवन यापन करें। अ.द. (149)

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