समृद्धि का आधार “वस्तु” है, न कि “पत्र मुद्दा”
धन को वस्तु में परिणित कराने की स्थिति में हम यह पाते हैं कि किसी वस्तु को 50 वर्ष पूर्व की तुलना में किसी का 100 गुना, किसी का 50 गुना, ‘प्रतीक मूल्य’ बढ़ा हुआ दिखता है। यथा 50 वर्ष पहले एक बोरी सीमेंट का मूल्य 1 रुपए रहा। आज 100 रुपए हो गई। 50 वर्ष पहले सोना 40 रुपए था, अभी 4000 रुपए हो गया। 50 वर्ष पूर्व 1 रुपए में 5 किलो चावल मिलता था। अभी 5 रुपए में एक किलो चावल से 35 रुपए में एक किलो चावल मिलता है। चावल, सोना और सीमेंट उस समय भी उतना ही मूल्यवाहक रहा है, जितना आज है। परिवर्तन केवल प्रतीक मुद्रा का रहा है। अ.श. (110)
समृद्धि सामान्य आकांक्षा और महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुओं के आधार पर हो पाता है न कि मुद्रा के आधार पर। इसका दूसरा भी गवाही यही है सामान्य आकांक्षा और महत्वाकांक्षा के वस्तुओं से ही मानव का तृप्ति अथवा सर्वमानव का तृप्ति है न कि मुद्रा (पत्र मुद्रा = नोट-पैसा) से। मुद्रा कितना भी होने पर वस्तु न होने की स्थिति बन सकती है। इसलिए मुद्रा से तृप्ति की संप्रभुता देखने को नहीं मिलती है। जबकि वस्तु हो, स्वस्थ मानव, तृप्ति पाने की संप्रभुता प्रमाणित हो जाती है। अ.श. (105)
वस्तुओं को संग्रह, भोग, अतिभोग की ओर प्रयोग करने का कार्य मानव विगत कई शताब्दियों से करता आया है। इसके लिए लाभोन्मादी अर्थ चिन्तन को ‘धन का विज्ञान’ के नाम से लोक व्यापीकरण किया। ऐसा लाभोन्मादी अर्थ चिन्तन समाज-रचना और व्यवस्था का आधार बिन्दु नहीं बना अपितु संघर्ष का आधार बना। संघर्ष विधि से संपूर्ण वस्तुओं का अपव्यय होना भावी हो गया। इसी कारणवश मानव शुभ चाहते हुए अशुभ के लिए प्रवर्तनशील होने विवश रहा। और संघर्ष को अपना लिया।
भ्रमित रहने की विवशता फलस्वरूप लाभोन्मादी, भोगान्मादी और कामोन्मादी प्रवृत्तियों में ग्रसित होना पाया जाता है। इन्हीं उन्मादों की ओर प्रवर्तित करने की क्रियाकलापों को विद्वता, कलाकारी, किंवा नेतृत्व भी मान लिया गया है। अस्तु, व्यक्ति में अंतर्विरोध, उसका स्रोत सुस्पष्ट होने के उपरान्त परिवार में अंतर्विरोध, मतभेद और द्वेष के रूप में; समुदायों की परस्परता में मतभेद विवाद और संघर्ष में ग्रसित रहना हम देख चुके हैं, सर्वविदित है। इसीलिए उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनशील विधियों का अध्ययन आवश्यक और अनिवार्य बन चुकी है। अ.श. (194-195)
यह भी देखा गया है कि जहाँ तक अर्थ पक्ष है ज्यादा कम के रूप में ज्यादा से ज्यादा व्यक्तियों के परस्परता मे संवाद, विचार, स्वीकृतियाँ है। इस पर सर्वेक्षण निरीक्षण, अध्ययनपूर्वक यह तथ्य पाया गया कि यह संवाद केवल प्यास को बढ़ाने के अर्थ में ही हुआ। गणितीय भाषा मे 2 है तो 4 चाहिए, 4 है तो 4000 चाहिये 4 अरब चाहिए यही प्यास है। प्यास सन्तुष्टि का अर्थ नहीं होती। अपने को कम होना पाते है उनके मन में यह भ्रम होता है कि ज्यादा धन जिसके पास है वह सुखी है जबकि वे ऐसे रहते नहीं है। उनका प्यास पीछे वाले से बहुत ज्यादा ही रहता है।