जितना ज्यादा धन रहता है उतना ही ज्यादा (अनेक गुणा का) प्यास बनता है ऐसा प्यास त्रासदी है। इसको हर व्यक्ति निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण कर सकता है चाहे गाँव हो, परिवार हो, बंधु हो, बांधव हो, पहचान का हो, पहचान का न हो। सब जगह यही पाते हैं।

समुदाय की परस्परता से और देश-देश की, राज्य-राज्य की, परस्परता में भी यही, प्यास का झंझट बना रहता है। जनप्रतिनिधि और जन सम्मानित व्यक्तियों में भी यह प्यास पायी जाती है। सभी संस्था और व्यक्ति लाभोन्माद से मुक्त नहीं है। लाभोन्माद का मतलब ही है, और चाहिये, और चाहिये और चाहिये। इसी का नाम प्यास है। धन की प्यास से पीड़ित आदमी सन्तुष्ट होना, सुखी होना समाधानित होना संभव है ही नहीं। इस प्रकार धन पिपासा हर व्यक्ति को त्रस्त किया ही है। इसी आधार पर हर संस्था भी इसी चक्र में फँसी हुई दिखाई पड़ती है। इन घटनाओं से हमें समझ में यह आता है कहीं न कहीं इसका तृप्ति बिन्दु तो चाहिए।

धन पिपासा दो ही बिन्दु, सुविधा और संग्रह के अर्थ में देखने को मिलती है। इस क्रम में संस्थाएँ कहलाने वाले चाहे राज्य संस्था हो, धर्म संस्था हो, अथवा समाज सेवी संस्था हो, इन संस्थाओ में धन की संतुष्टि होती ही नहीं। सुदूर विगत से यह प्रक्रिया संपन्न होते आयी। ज.व. (61-62)

परिवार में श्रम नियोजन, परिवार में समृद्धि

ज्ञान, विज्ञान दर्शन और तर्क संगत विधि से सम्पन्न होना और मानवीयतापूर्ण आचरण में दृढ़ रहना ही स्वायत्त मानव का स्थिति रूप है। ऐसे प्रत्येक मानव ही परिवार मानव के रूप में परिवार की परिभाषा को चरितार्थ रूप दे पाता है। मानव परिवार की परिभाषा और व्याख्या इस प्रकार होना देखा गया है कि कम से कम 10 व्यक्ति परस्परता में सम्बन्धों को पहचानते हैं, स्थापित और शिष्ट मूल्यों को निर्वाह करते हैं, मूल्यांकन करते हैं और उभयतृप्ति पाते हैं। इसी के साथ परिवारगत उत्पादन कार्य में एक दूसरे के पूरक हो पाते हैं। फलत: परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर लेते हैं।

इस प्रकार समाधान और समृद्धि का स्रोत परिवार से प्रचलित होना संभव हो जाता है।

प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही समाधान है। यह मानव में होने वाली है, न कि सुविधा संग्रह में, न ही यंत्रो में:- बहुत ज्यादा आहार और अलंकार संबधी (अन्न, सोना, चाँदी) द्रव्यों को इकट्ठा कर लेने मात्र से ही ये वस्तुएँ समाधान का आधार बन गई हों ऐसा कुछ नहीं हुआ। सार रूप में, वस्तुओं का संग्रह समाधान का मार्ग नहीं रहा। समाधान का आधार केवल मानव जागृति सहज वैभव ही है। मानव में समाधान अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में अनुभव व प्रमाण हैं - मानव सह-अस्तित्व में इन अंतर्सम्बन्धों को जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में समाधानित होता हैं। अंतरसंबंध पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था में तथा इनके आपस में पाए जाते है। अ.श. (150-151)

Page 109 of 130