जीव संसार में विभिन्न जीवो की स्वीकृति, सर्वमानव में एक सा होना पाया जाता है। इसी प्रकार जल, वायु की स्वीकृति एक सा होना पाया जाता है।
इससे यह स्पष्ट होता है, जिन मुद्दो पर सार्वभौमता नहीं हुई है, उन सभी मुद्दो पर पुन: विचार, परामर्श, विश्लेषण, विवेचना सहित सार्वभौम स्वीकृति के रूप में मानव स्वयं पा लेना अर्थात मानव कुल पा लेना सर्वशुभ के लिए आगे की कड़ी है। अभी तक जितनी भी स्वीकृतियाँ भ्रम के आधार पर अथवा जागृति के आधार पर बन चुकी है, इनके मूल में शुभ की अपेक्षा, घोषणा, प्रयोग, प्रयास, अभ्यास व्यवहार कार्य किया जाना स्पष्ट है।
यह सब प्रयोगो का नजीर रहते जिन-जिन मुद्दो में सार्वभौम स्वीकृति नहीं हो पाई है उसे स्वीकृति की एकरूपता में घटित करा लेने से ही समुदायिक फर-फंदे का उन्मूलन हो पायेगा।
फरफंद का तात्पर्य भ्रमित मान्यता के आधार पर द्रोह, विद्रोह, शोषण और युद्ध तक पहुंचने का रास्ता से है। इसलिए सार्वभौम के ध्रुवो पर और मानव कुल की अखंडता के ध्रुव पर, सम्पूर्ण अध्ययन पर, सार्वभौम स्वीकृति के रूप में, सार्वभौम स्वीकृति का तात्पर्य सर्वमानव स्वीकृति अथवा सम्पूर्ण देश, काल में होने वाली स्वीकृति से है, इसमें एकरूपता की आवश्यकता बनी रहती है। इस क्रम में मानव अपनी महिमा मंडित मर्यादा को पहचानना अवश्यंभावी है। ज.व. (189-191)
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक सुख-सुविधा में प्रमाणित स्वरूप और मानसिकता सुस्पष्ट रूप में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति में प्रमाणित नहीं हो पाती। मूल मुद्दा यही है कि सुविधाएं और संग्रह इंद्रियां सन्निकर्षात्मक, अतिभोग, बहुभोग भोग इसे वर्तमान तक अर्थात् बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक तक अभिप्राय माना गया। इसके निष्कर्ष को इस प्रकार देखा गया कि सुविधा-संग्रह-भोग-अतिभोग के क्रम में सुख भासते हुए इसकी निरंतरता नहीं होती - यह सर्वविदित है ही। जबकि हम मानव सदा सदा से सुखा अपेक्षा से ही परंपरा क्रम में व्यक्त होते आ रहे हैं। यह घटना अर्थात् संग्रह-सुविधामूलक सुखपेक्षाएँ सदा सदा ही हर व्यक्ति में क्षणिकता में भंगुरता को स्थापित कराते ही आया है।
ऐसी क्षणिकता (सुख भासने वाली क्षणिकता) को पाने के लिए दिवा रात्रि संग्रह-सुविधा का परिकल्पना-सम्पादन कार्यों में लगा रहता हुआ अथवा लगे रहने के लिए इच्छा करने वाले स्थितियों में अधिकांश लोगों को दिखा गया।
इसका तात्पर्य यही हुआ अभी तक हम एक ‘सार्वभौम मानव’ जो समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व को प्रमाणित करता है, उनको पाकर उनके जैसा हर व्यक्ति मानवाधिकार सम्पन्न स्वरूप से ख्यात होना संभव नहीं हो पाया। इसकी आवश्यकता को प्रकारांतर से परिकल्पना में लाते ही रहे और इस मान्यता से शुभेच्छा सम्पन्न संस्थाएँ काम करते रहे हैं कि यथा स्थितियाँ सुख-चैन का आधार है। जीवन ही सुखी होता है। समझदारी का धारक वाहक जीवन ही है। समझदारी से ही समाधान है। समाधान सार्वभौम है। अ. श (176 -177)