“मैं समझ सकता हूं और जीकर प्रमाणित हो सकता हूं।” जब तक यह स्वयं में भरोसा नहीं बनता, एक शब्द तक नहीं पहुंच पाएंगे। मानव ही एकमात्र वस्तु है, जो समझ सकता है, प्रमाणित कर सकता है। (संवाद भाग -2) पृ 229-230

इसी को समझाया:

श्रवण – लिखा हुआ को तर्क संगत विधि से समझना, शब्द का अर्थ स्पष्ट होना । ‘अनेक भाषा को एक ही अर्थ में एकत्रित करना’ । श्रवण के लिए शास्त्राभ्यास -इसमें भास् होता, आभास होता है ।

  • <strong>मनन</strong> – श्रवण से प्राप्त अर्थों में जीना, उनका आभास पूरा होना, निष्कर्ष स्थिर होना । मनन प्रक्रिया में न्याय धर्म सत्य का आभास पूरा होता है । इसमें व्यवहाराभ्यास, कर्माभ्यास, साक्षात्कार करने के लिए अभ्यास ।
  • <strong>साक्षात्कार</strong> – शब्द से इंगित वस्तु को अस्तित्व में “वस्तु” रूप में पहचानना । साक्षात्कार होने से प्रतीति होता है । जो साक्षात्कार हुआ, वो साथ साथ बुद्धि में स्वीकार होते जाता है । ऐसा बोध होने से ‘अध्ययन’ हुआ, नहीं तो नहीं हुआ । (संवाद – २००७, २०१२)
  • अध्ययन वस्तु

अस्तित्व ही अध्ययन के लिए संपूर्ण वस्तु है।

कुल मिलाकर समझने के लिए तीन मुद्दे हैं:-

  • सह अस्तित्व को समझना = ”अस्तित्व दर्शन ज्ञान”
  • सह अस्तित्व में स्वयं को समझना = “जीवन ज्ञान”
  • सह अस्तित्व में जीने को समझना = “मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान” (संवाद 2008)
  • क्या क्यों और कैसे का उत्तर (समझ)
  • इस विधि से अस्तित्व क्यों है? कैसे हैं ? इसे समझना।

मानव क्यों है ? कैसा है ? इसे समझना।

मानव का मानव के साथ संबंध क्यों है ? कैसा है ? इसे समझना।

  • नैसर्गिक संबंध (पदार्थ प्राण जीव) क्यों है ? कैसा है ? यह समझने के लिए वस्तु है।
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