जीना का तात्पर्य, मानव तथा नैसर्गिकता (मानवेत्तर प्रकृति) के साथ सहअस्तित्व प्रामाणिक होना। मानव के साथ न्याय पूर्वक जीना, मानवेत्तर प्रकृति के साथ ‘प्राकृतिक नियम’ पूर्वक जीना। संवाद (2008)

सहज स्वीकार, स्वीकृति

(“सहज स्वीकृति” का मतलब)

सहअस्तित्व सभी मानव को स्वीकार है।

प्रत्येक मानव कल्पना, आवश्यकता, अपेक्षा रूप में सच्चाई को स्वीकारता है। - भ.व. , प. स.

मानव परंपरा में हर संतान अथवा हर मानव कल्पना सहज स्वीकृति के रूप में जागृति को वर्ना देखा गया है। अ.व. (2000, पृ. 89,170)

  • जागृति जीवन सहज स्वीकृति रहता है। - भ.व. (1998) (पृ. 335, 150, -109)
  • मानव को समस्याएँ स्वीकृत नही है। अपितु समाधान सहज ही स्वीकृत है।
  • मानव शुभ को स्वीकारता है। इसलिए जागृति को स्वीकारने के लिए बाध्य भी है। मानव ही दृष्टा पद (समझने योग्य) में है। इसे स्वीकारने के लिए हर व्यक्ति बाध्य है। बाध्यता का तात्पर्य आवश्यकता, विचार, इच्छा, कल्पना के रूप में स्वीकारने से है। - स.श(1999), पृ. (207,166)
  • शैशव अवस्था में ही जीवन को जागृति, अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था स्वीकृत रहता ही है।
  • सार्वभौम का तात्पर्य सर्वमानव स्वीकृत हो, स्वीकृति योग्य हो। - म्. वि. (1998) पृ. 201
  • सर्वमानव में मानवीयता स्वीकार होता है। -(संविधान 2007) पृ। 42
  • सहज स्वीकृति - परिभाषा

सहज = स्वभाव गति = तव सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी।

स्वीकार = पूर्णता, आवश्यकता, अनिवार्यता के अपेक्षा में किया गया ग्रहण।

  • <strong>स्वीकृति</strong> = अपनाया गया = भास, आभास, प्रतीति, अनुभूति। - प.स.(2008)
  • <strong>- ‘सहज स्वीकृति’: भास्, आभास, प्रतीति कुछ भी हो सकता है । </strong>प्रतीति हुआ तो अध्ययन हुआ, प्रतीति नहीं हुआ तो अध्ययन नहीं हुआ । अब जो है, मानव ‘सुन लिया’ तो ‘स्वीकार’ हो गया मानता है । सहज स्वीकृति से हम अपने व्यवहार को जांचना आरम्भ कर सकते हैं । इसका आधार के लिए मध्यस्थ दर्शन का सूचना चाहिए । जीवन क्रियाएं, स्व-निरीक्षण विधि से समझ आता है । अस्तित्व में सच्चाईयां अध्ययन में आता है । इसके लिए भी मध्यस्थ दर्शन का विधिवत अध्ययन आवश्यक है । विधिवत अध्ययन से
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