अस्तित्व दर्शन, जीवन, मानवीय आचरण से सम्बंधित सभी वस्तुएं हमें स्पष्ट होते जाते हैं, स्वीकार होते जाते हैं - यह पहले भास्, फिर आभास, फिर प्रतीत होता है । यह अध्ययन विधि से होता है । इस प्रकार ‘स्वीकृति’ पूरे जीवन में रखा है (संवाद २००९)
(कौन समझेगा)
“पुस्तक समझता नही। यंत्र समझता नही। मानव ही समझता है, जीता है, मानव (स्वयं) ही सुखी-दुखी होता है। इसलिए, मानव (स्वयं) को ही समझना पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति को समझना पड़ेगा। एक आदमी समझने से बाकी समझ गए ऐसा होता नही।”