बहुत अधिक तादाद में आज धरती को वस्तुओं को सुविधा योग्य वस्तुओं में परिवर्तित करना है, ऐसी सभी वस्तुएँ सभी मानव को मिले, ऐसा सोचने पर आज की स्थिति भी जितनी सुविधाजनक वस्तुएँ हैं, वे सभी वस्तुएँ आज जितनी संख्या में इस धरती पर मानव है, सबको उतनी तादाद में बनी वस्तुएं नहीं मिल सकती है।

इसके दो प्रधान कारण हैं –

इस धरती पर उतनी वस्तुएं नहीं है, जिससे एक व्यक्ति को यह परिवार को उसकी कल्पना के अनुसार सुविधा मिल सकें। इन कल्पना के अनुकूल वस्तुओं को बनाने के लिए आज जितनी प्रौद्योगिकी है उससे कम से कम अरबों गुना अधिक आवश्यकता बनी है। ऐसी अरबों गुना प्रौद्योगिकी के लिए धरती के स्त्रोत पूरा होना संभव नहीं है। इसके लिए यह धरती छोटी पड़ेगी। इससे होने वाले प्रदूषण को भी धरती अपने में समाने की स्थिति में नहीं रहेगी। इसलिए यह भी पुनर्विचार करना आवश्यक है।

  • सुविधा संग्रह और भोगवाद “व्यवस्था” का सूत्र व्याख्या और प्रयोजन का आधार नहीं बना सका। उक्त दो बिंदुओं में केवल सुविधा की राशि और व्यवस्था की झलक अथवा व्यवस्था की कसौटी मात्र से ही निष्कर्ष निकलता है। इसके अलावा मानव के धरती के साथ जो अत्याचार किया हैं उसके लिए अपराध कार्यों में पारंगत बनाने का धंधा बना रहा है, इसके निराकरण का, उसके समाधान के लिए भी कोई ना कोई उपाय चाहिए।
  • उपाय के रूप में “समाधानात्मक भौतिकवाद” प्रस्तुत है। इस दशक के कार्य रूप के अनुसार सुविधावादी वस्तुएँ जो भोगने के लिए आवश्यक मान ली गई हैं, उनके लिए जितनी वस्तुओं को धरती से निकालकर उपयोग कर रहे हैं, उससे भी अधिक वस्तुओं को युद्ध सामग्रियों के रूप में परिणत कर रहे हैं।

किसी देश में इस समय जन सुविधा के लिए वस्तुएँ की तादाद कम है, इससे अधिक युद्ध सामग्री के लिए उपयोग करते होंगे।

इन स्थितियों पर नजर डालें तो यह पता चलता है कि धरती में स्थित वन, खनिज, साधन, अथवा द्रव्य कितने दिन तक पूरे पाते हैं। इन सब को यह निष्कर्ष हम निकाल सकते हैं कि एक- दो पीढ़ी तक ही धरती में यह सब द्रव्य पूरे पाएंगे। इससे हमें ज्ञात होता है कि भविष्य की पीढ़ियों के साथ हम कितना अपराध कर रहे हैं? खिलवाड़ कर रहे हैं या मदद कर रहे हैं ? इस बात का भी आंकलन आवश्यक है। “ नैसर्गिकता के साथ हम क्या करें?” नैसर्गिकता का संतुलन इस धरती के लिए ऋतुमान के रूप में प्राप्त है। इसको हर मानव देख पा रहा है।

अस्तु मानव की स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी आवश्यक है। इस धरती में ऋतु संतुलन को ध्यान में रखते हुए मानव के लिए जीने की कला, विचार, शैली और अनुभव को विकसित करना अनिवार्य स्थिति बन चुका है इसका आधार है “सह-अस्तित्ववाद प्रमाणित करना।" ज.व. (71)

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