गयी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्राणावस्था में कोष रचनायें जितना उन्नत रहा, जीवावस्था के लिए पर्याप्त नहीं हुआ, और विकसित होने की आवश्यकता रही, चाहे विकास क्रम ही क्यों न हो।
इससे यह ज्ञान स्पष्ट हो जाता है, जीवों के शरीर रचना क्रम में स्त्री पुरुष शरीर रचना का सुस्पष्ट रूप प्रकट हो गयी।
जीवों के लिए आहार, प्राणावस्था से संपन्न होता आया है, इस ढंग से पूरकता और उपयोगिता सुस्पष्ट है। इस प्रकार पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था परस्पर पूरक व उपयोगी सिद्ध हुआ। सर्वप्रथम प्राणावस्था का उपयोग, किसी न किसी जीव परंपरा के शरीर रचना में, प्राणकोषाओं के तृप्ति की उपरान्त ही अग्रिम रचना विधि प्राणकोषाओं में उत्सव के रूप में उभरना स्वभाविक रहा। इसी आधार पर किसी-किसी जीव शरीर से सप्त धातुओं का समावेश और सर्वाधिक समृद्ध मेधस रचना संपन्न हुई।
ऐसे शरीर में ही प्राणकोषाओं के संयोजन से होने वाली प्रजनन प्रणाली मानव शरीर की रचना होना प्राकृतिक प्रणाली रही। ऐसी शरीर रचना विभिन्न परिवेशों में अर्थात् भौगोलिक परिवेश में, विभिन्न जीव शरीरों से निष्पन्न होने की संभावना भी स्पष्ट है।
इसका प्रमाण इस धरती पर अनेक नस्ल के मानव शरीर रचना का होना है। इससे भी अपने नस्ल का ध्रुव बिन्दु, मूलभूत जीव शरीर से मानव शरीर का निष्पत्ति होना स्वीकारा जा सकता है. यह तो स्पष्ट है ही, मानव अपने आधार , आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी आवश्यकताओं के लिए पदार्थ, प्राण, जीवावस्था पर निर्भर है ही। निर्भर होते हुए, संबंध होते हुए इसे ध्वस्त करने में लगे है। “जो भी है”- यह सब “अस्तित्व” ही है। मानव भी अस्तित्व में ही है। आगी अस्तित्व का “सहअस्तित्व” रूप में अध्ययन है।
1.1 अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है
सहअस्तित्व = व्यापक वस्तु (सत्ता) में, “ भीगा, डूबा, घिरा “ (संपृक्त) जड़ चैतन्य प्रकृति
व्यापक वस्तु = खाली स्थान, असीम वस्तु
= “सत्ता” = साम्य ऊर्जा
संपृक्त = भीगा, डूबा, घिरा