हर मानव विरोधो से मुक्ति पाना चाहता ही है। इसी तथ्यवश इसकी संभावना सुस्पष्ट होती है। प्रमाणित होना मानव परम्परा को ही है।

मानव ही भ्रमवश गलतियो को करता हुआ, अपराधो को करता हुआ, द्रोह, विद्रोह, शोषण करता हुआ देखने को मिलता है। इसका साक्ष्य हर देश के संविधान में गलती को गलती से रोकना, अपराध को अपराध से रोकना और युद्ध को युद्ध से रोकने की व्यवस्था दे रखी है। यही शक्ति केन्द्रित शासन, संविधान व्यवस्था मानी गई है। इसके साथ समुदायों का सहमति भी है और विरोध भी है। इसका सर्वेक्षण से पता चलता है स्वयं पर गुजरने में विरोध, असहमति और संसार में घटित होने में सहमति है।

इस क्रम में अभी तक अपराध और गलतियों का सुधार, युद्ध-मुक्ति का उपाय, मानव परंपरा में सूझबूझ के रूप में, कार्य-व्यवहार प्रमाण के रूप में उद्घाटित नहीं हो पाया। कुछ लोग इसकी आवश्यकता को अनुभव करते रहे।

मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद गलती और अपराध के सुधार का उपाय सुझाया। इसी के साथ मानवत्व सहित परिवार व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी को मानव स्वीकारने की स्थिति में युद्ध-मुक्ति अवश्यंभावी होना स्पष्ट कर दिया। इसमें इतनी ही आवश्यकता जनमानस और लोककल्याणकारी, राजनैतिक, धर्मनैतिक, समाजसेवी संस्थाओ के पारंगत होने के आधार और शिक्षा विधा में मानवीयता का अध्ययन सुलभ कराने की आधार पर निर्भर है। यह अध्ययन सुलभ होने के उपरान्त ही सर्वसुलभ होना स्वाभाविक है।

हर मानव अपने में, से, के लिए सुलझना ही चाहता है, उलझना नहीं चाहता। उलझते हुए व्यक्तियों का उद्गार यही है उलझन एक मजबूरी है। उलझन से मुक्ति पाने की इच्छाएँ निहित रहती ही है।

इसीलिए सुलझन की संभावनाएँ समीचीन होना सुपष्ट होती है। सभी सुलझन समझदारीपूर्वक मानव व्यवस्था में जीना ही है। सुलझन ही सदा सदा से मानव की अपेक्षा है। सारे अड़चनों का कारण नासमझी है, समस्या है। सम्पूर्ण समस्याएँ मानव की सुविधा, संग्रह, भोग, अतिभोग प्रवृति की उपज है। इन सारी स्थितियों को देखने पर पता चलता है समझदारी ही मानव का समाधान और समृद्धि का निर्वाध गति है, अथवा अक्षुण्ण गति है अथवा निरन्तर गति है। गति सदा सदा से मानव परम्परा के रूप में ही होना सम्भावित है। समझदारी पूर्ण परम्परा ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का एक मात्र उपाय है। दूसरी किसी विधि से व्यवस्था की सार्वभौमता और समाज की अखंडता को अभी तक स्पष्ट नहीं कर पाये।

मानव में समझदारी का स्रोत सर्वसुलभ होना ही है। ऐसे कार्य में आप हम सभी को भागीदार होने की आशा अपेक्षा और कर्तव्य है। इसी आशय को सार्थक संवाद में, अवगाहन में लाने का यह प्रयास है। सर्व शुभ हो ! ज.व. (92-95)

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