भीगे रहने से उर्जित, घिरे रहने से प्रकृति नियंत्रित, डूबे रहने से प्रकृति क्रियाशील है।

प्रकृति = क्रिया = इकाई

जड़ = पहचानना, निर्वाह करना

चैतन्य = (जानना) मानना, पहचानना, निर्वाह करना

= जीवन

अस्तित्व = होना, अविनशीयता । म.वि. (133-134)

समाधान = सुख। समस्या = दुख। अव्यवस्था का प्रभाव = समस्या = पीड़ा। अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इस धरती पर पदार्थावस्था मृद मृदत्व के साथ, सभी धातुएं धातुत्व के साथ, पाषाण पाषाणत्व के साथ, मणियां मणित्व के साथ व्यवस्था हैं। यह समग्र व्यवस्था के साथ भागीदारी है।

हर वस्तु का स्वयं में व्यवस्था होना, उसके परस्परता में सह- अस्तित्व सहित वर्तमान होने से है। यही समग्र व्यवस्था में भागीदारी का सूत्र है। वर्तमान, निरंतरता के अर्थ में है। अ.व. (229-230)

अस्तित्व ही सह-अस्तित्व है। सह-अस्तित्व ही नित्य प्रभावी प्रकटनशील है। अस्तित्व में जो कुछ भी है- यह सब ‘वस्तु’ के रूप में है क्योंकि इनमें वास्तवकिताएँ नित्य प्रमाणित हैं। अस्तित्व में व्यापक और एक-एक के रूप में अनन्त इकाईयाँ वर्तमान में होना दिखाई पड़ती है। जिसका दृष्टा मानव ही है। अस्तित्व में जो वस्तुएँ है, जितनी भी है इन्हीं वस्तुओं का नामकरण करना मानव का अधिकार सहज क्रियाकलाप है। जैसा- ‘मिट्टी’ एक नाम है। मिट्टी नाम से इंगित वस्तु अस्तित्व में है ही। यह (मिट्टी) स्वयं में केवल नाम न होते हुए भी “वस्तु” के रूप में वर्तमान है।

इसी प्रकार हर नाम से इंगित वस्तु अस्तित्व में होना वर्तमान है। व्यापक वस्तु में ही सम्पूर्ण एक-एक भीगा-डूबा और घिरा हुआ होने के आधार पर व्यापक वस्तु को सत्ता नाम दिया है।

पहले से भी कुछ नाम है - वह है अध्यात्म। व्यापक वस्तु को पूर्व में सार्थक रूप में समझना-समझाना बन नहीं पाया था। अभी इस व्यापक वस्तु को हर मानव समझ पाना संभव हो गया है। एक-एक के रूप में जो वस्तुएँ है, (प्रकृति) इन्हें परस्परता में देखने के पहले ही व्यापक वस्तु दिखता ही है। ज. व. (96-98)

व्यापक वस्तु को इस तरीके से समझना संभव हो गया है, कि हर परस्परता के बीच निश्चित दूरियां होती ही है। इस दूरी की परिकल्पना और अनुभव होता है। यही व्यापक वस्तु है क्योकि हर परस्परता के बीच दूरी के रूप में दिखाई पड़ने वाली वस्तु सभी परस्परता में एक ही है। जैसे दो आदमियों की परस्परता में, दो जानवरो की परस्परता में, दो झाड़ो की परस्परता में, से दो प्राण कोषाओं की परस्परता में दो अणुओं की परस्परता में, दो परमाणु अंशो की

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