प्रकार मनुष्य द्वारा प्राण कोषाओं को घटाना (घटित कराना) संभव नहीं है और आवश्यक भी नहीं है। वर्तमान में पाए जाने वाले शरीर और जीवन के क्रियाकलाप के साथ-साथ मनुष्य का जागृत होना ही एकमात्र लक्ष्य बनता है। कृत्रिम कोषा और कृत्रिम जीवन को बनाने का कोई प्रयोजन नहीं बनता है। इसलिए आवश्यकता भी नहीं बन पाता है और इसीलिए अवसर भी सिद्ध नहीं होता।
चारों अवस्थाओं में रूप, गुण, स्वभाव धर्म
व्यापक वस्तु में प्रकृति (इकाई समूह) रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सम्पन्न है और अविभाज्य है। प्रत्येक इकाई के चार आयाम है। (रूप = आकार, आयतन, घन; गुण = परस्परता में प्रभाव, सापेक्ष शाक्तियाँ; स्वभाव = मौलिकता = प्रयोजन = अर्थ; धर्म = धारणा = होना = जिसका जिससे विलगिकरण ना हो वही उसका धर्म)। (रूप और गुण परिवर्तनशील है जबकि स्वभाव धर्म शाश्वत है। गुण परस्परता के अनुसार बदलता है। स्वभाव = इकाई का उसके अवस्था में भागीदारी। धर्म और स्वभाव स्थिति में है। गुण और रूप गति में है = स्वयं में व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी) (रूप, गुण, स्वभाव, धर्म इकाई से अविभाज है) प्रत्येक इकाई का अपने अवस्था अनुसार स्वभाव- धर्म निश्चित है, जो बदलता नहीं। जबकि गुण, जाती प्रजाति के अनुसार है तथा रूप प्रत्येक इकाई के साथ हैं) भ. व. (294-300)
धर्म
अस्तित्व में चारों अवस्थाएँ, सत्ता में संपृक्त वर्तमान है। चारों अवस्थाएँ सत्ता में अविभाज्य हैं। इसीलिए “अस्तित्व” अथवा होना ही संपूर्ण वस्तु का मूल धर्म है। पदार्थावस्था का धर्म ही अस्तित्व, स्वभाव संगठन-विघटन क्रिया हैं। प्राणावस्था में अस्तित्व सहित पुष्टि धर्म; सारक-मारक स्वभाव है। जीवावस्था में अस्तित्व, पुष्टि सहित आशा धर्म है। अस्तित्व, पुष्टि शरीर में देखा जाता है। आशा धर्म को जीवन में ही देखा जाता है। इस प्रकार जीवावस्था में जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में प्रकाशित होना स्पष्ट है। जीवावस्था में स्वभाव क्रूर और अक्रूर रूप में हैं। ज्ञानावस्था में अस्तित्व, पुष्टि, आशा सहित सुख धर्म होना पाया जाता है। अस्तित्व, पुष्टि मानव शरीर में दिखता है, सार्थक होता है। जीवन में संस्कार और सुख सार्थक होना आवश्यक है।
स्वभाव
स्वभाव जागृति क्रम में अमानवीय, जागृति पूर्वक मानवीय और जागृति पूर्णता के रूप में अतिमानवीय होना पाया जाता है। यह अमानवीयता की स्थिति में दीनता, हीनता, क्रूरता के रूप में दिखता हैं और जागृति स्थिति में धीरता, वीरता, उदारता के रूप में दिखता है। जागृति पूर्ण स्थिति में दया, कृपा, करुणा के रूप में स्वभाव दिखता है। अमानवीय स्वभाव ही दुखी होना; मानवीय स्वभाव ही सुखी होना और अतिमानवीयता का स्वभाव ही आनंद होना