संज्ञानशीलता (समझ, ज्ञान) विधि से ही हर व्यक्ति समाधान समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को सर्वशुभ के अर्थ में स्वीकारता है जबकि संवेदनशीलता विधि से शब्द, स्पर्श, रूप, रस गंधेन्द्रियों के अनुकूलता, प्रतिकूलता क्रम मे ही संग्रह सुविधा भोग अतिभोग की ओर ग्रसित होता हुआ समुदायो, परिवारो और व्यक्तियों को देखा गया है।
संज्ञानशीलता = जानना – मानना। संवेदनशीलता = पहचानना – निर्वाह करना। ज.व. (47-48)
शब्देन्द्रिय का तात्पर्य शब्दों को सार्थक निरर्थक रूप में विभाजित करने की क्रिया, सुनने; स्पर्श से कठोरता और मृदुलता को स्वीकारने की क्रिया, घ्राणेन्द्रियों से सुगन्ध और दुर्गन्ध को विभाजित करने की क्रिया, रूपेन्द्रियों से सुरूप, कुरूप की विभाजन क्रिया; रसनेन्द्रियों से खट्टा-मीठा, चरचरा, खारा, कसैला और तीखा इन रूचियों को विभाजित करने की क्रिया। कर्मेन्द्रियों का तात्पर्य हाथ, पैर, मल-मूत्र द्वार और मुँह ये सब कर्मेन्द्रियों में गण्य होना पाया जाता है। स.श. (246)
2.2 जीवन स्वरूप, क्रिया
मानव जीवन और शरीर का संयुक्त रुप है।
शरीर के किसी अंग-अव्यय में न्याय, समाधान, सत्य की प्रतीक्षा, अपेक्षा शरीर सहज ज्ञानेंद्रियां कार्यों कर्मेंद्रिय कार्यों में देखी दिखाई नहीं पड़ती। जैसा हाथ को न्याय की अपेक्षा, आंख, कान जीभ में न्याय, समाधान, सत्य की अपेक्षा चिन्हित रूप में समझने का कितना भी कोशिश करें निषेध ही निकलता है। ज्ञानेंद्रियों में जब ज्ञान की अपेक्षा स्वरूप रूपी न्याय, समाधान, सत्य कान, आंख, नाक व्यंजित नहीं कर पाता है अपितु इसमें उन उन ज्ञानेंद्रियों के लिए अनुकूल वस्तुओं का संयोग (सन्निकर्ष) अच्छा लगता लगना होता है। यह अच्छा लगा किसको ऐसा पूछा जाए हाथ, नाक, कान आंख में अच्छाइयों का कोई गवाही स्थिति नहीं रहता है । अ. व.(200-201)
यह भी देखा गया है, जैसे-पाँचों ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कोई भी भोग-प्रक्रिया को सम्पादित करें, उसकी निरंतरता नहीं हो पाती। इसीलिए भोग में असंतुष्टि का होना भी पाया जाता है। जबकि हर मानव हर समय संतुष्ट रहना चाहता है। संतुष्टि का इच्छुक हर व्यक्ति है। हर व्यक्ति के सम्मुख यह विचारणीय बिन्दु है कि क्या व्यक्ति सदा भोगवादी विधि से संतुष्ट रह सकता है ? क्या असंतुष्ट रहना जरूरी है ? क्या संतुष्टि की निरंतरता हो पाती है ? क्या असंतुष्टि ही असंतुष्टि हाथ लगती है ? इन प्रश्नों को परीशीलन करने के पहले हमें इन बातों का ध्यान रहना आवश्यक है कि मैं (मानव) जीवन और शरीर का संयुक्त रूप हूं।
जीवन नित्य है, शरीर जीवन के लिए सामयिक घटना है। जीवन चैतन्य वस्तु है, शरीर भौतिक रासायनिक वस्तु है। इस प्रकार शरीर यात्रा तक मानव कहलाता हूँ और शरीर यात्रा के अनन्तर जीवन रहता ही है।
जीवन, शरीर यात्रा समय में अपने जागृति को प्रमाणित करना उद्देश्य है। इस आधार पर और मानसिकता से उक्त बिन्दुओं का विश्लेषण करना संभव है। पहला विचारणीय पक्ष सदा-सदा मानव तृप्त हो सकता है ? इसका उत्तर हाँ