जलवायु में पले विभिन्न रंग रूप के होने के कारण मानव से मानव की रूप रंग की विषमता, उसी के साथ भाषा की विषमता के संयोग से विरोधों का प्रदर्शन, असंख्य हिंसाओं के रूप में साक्षित है।

प्राकृतिक भय, पशुभय, मानव में निहित अमानवीयता (हिंसा, शोषण, द्रोह, विद्रोह, प्रवृत्ति) का भय अर्थात अथ से इति तक भय के विभिन्न स्वरूपों को परिलक्षित किया गया है और हर व्यक्ति इन्हे परिलक्षित कर सकता है।

भिन्न-भिन्न मानव कुल और परम्पराओं का विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में आरंभ होना एक नियति सहज विधि है। इसी आधार पर ही भिन्न-भिन्न मानसिकता का होना स्वयं साक्षित है। इसे हर व्यक्ति अपनी संतुष्टि के लिए अथवा निश्चयन के लिए सर्वेक्षित कर सकता है। आज की जनचर्चा में इन्ही मुद्दों का उद्घाटन है। प्रधानत: सामान्य जनमानस सुविधा-संग्रह के मुद्दे पर रोमांचित होता हुआ, उत्साहित होता हुआ देखने को मिलता है।

सुविधा-संग्रह विधा में जिनकी कुछ पहुंच बन चुकी है, ऐसे लोगों में भोग, अतिभोग, बहुभोग रोमांचिकता का मुद्दा बना हुआ देखने को मिलता है।

आज की स्थिति का निरीक्षण, परीक्षण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि राज्य, धर्म, व्यापार में भागीदार सभी मानव सुविधा-संग्रह को छोड़कर दूसरा कुछ कर नहीं पा रहें हैं। आज तक शिक्षा में उन्नयन (विकास) के नाम से व्यवसायिक शिक्षा के रूप में ही शिक्षा का ढाँचा-खाँचा बना हुआ है। शिक्षा रूपी व्यवसाय भी व्यापार के रूप में ही अथवा व्यापार के सदृश ही सुविधा-संग्रह की ओर प्रवर्तित देखने को मिल रहा है।

इन सब को देखकर कृषि में निष्ठा रखने वाले, परिश्रम में विश्वास रखने वालों में सुविधा-संग्रह की ओर प्रवृत्ति होना स्वाभाविक है। क्योंकि चारों गद्दियों में आसीन उनके साथी-सहयोगियों का जलवा और रूतबा ही इनके लिए आदर्श रहा है।

सर्वाधिक लोग आज भी कृषक और श्रमजीवी हैं तथा यही लोग, लोक सामान्य और आम जनता के नाम से जाने जाते हैं। भ. व. (1-25)

प्राकृतिक असंतुलन

पदार्थावस्था से प्राणावस्था, प्राणावस्था से जीवावस्था, जीवावस्था से ज्ञानावस्था अनुबंधित हैं ही (पूर्णता के अर्थ में संबंध) इसका प्रमाण इस सब का वर्तमान ही है। पदार्थावस्था– मिट्टी, पत्थर, मणि, धातु; प्राणावस्था – पेड़, पौधे, वनस्पति; जीवावस्था- जीव, जानवर; ज्ञानावस्था – मानव। इस आधार पर ज्ञानावस्था से जीवावस्था, जीवावस्था से प्राणावस्था, प्राणावस्था से पदार्थावस्था की परस्परता में अनुबंध है।

इनमें से मानव के अतिरिक्त सभी अवस्थाओं ने अपने अनुबंध को पूरक विधि से प्रमाणित किया है।

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