क्योंकि पदार्थ अवस्था के अनंतर प्राणावस्था, पदार्थावस्था प्राणावस्था के अनंतर जीवावस्था, पदार्थ अवस्था प्राणावस्था जीवावस्था के अनंतर ज्ञानावस्था का प्रदूभव, प्रकाशन इस धरती पर हुआ है। इस धरती पर मानव की समझ में यह भी आता है कि जीवावस्था, प्राणावस्था, पदार्थावस्था परस्पर पूरक है। वे सब मानव के लिए पूरक है ही; पर बीसवी शताब्दी के अंत तक मानव ने जो कुछ किया है, उससे मानव का अन्य तीनों अवस्थाओं की प्रकृति के साथ पूरक होने के स्थान पर विरोधी होना व विद्रोही होना प्रमाणित हुआ है।
इसका प्रमाण प्रबुद्ध विकसित कहलाने वाले लोगों की ही आवाज है कि :
- प्रदूषण बढ़ गया जबकि प्रदूषण का कारक तत्व केवल मानव हैं।
- धरती पर वातावरण असंतुलित हो गया है, बिगड़ रहा है।
- समुद्र में पानी का सतह बढ़ने लगा है।
- वन संपदा उजाड़ गया है।
- ऋतु असंतुलित हो रहे है।
- जनसंख्या बढ़ रहा है।
ये सब कहने वाले विकसित देश है, विकासशील देश है, अविकसित देश इन देशों के निष्कर्ष को मानते ही रहे है। यही आज की बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक तक गंभीर चर्चाओं की वस्तु रही है। भ.व. (105-111)
“सहस्तित्ववादी विधि से समाधान संभव है”
सह-अस्तित्ववादी विचार, ज्ञान, विवेक, विज्ञान को समझना ही समझदारी (समाधान) है। क्योंकि आदर्शवाद और भौतिक वाद के अनुसार जितना जीये, समझे, उससे कोई सर्वशुभ विधि प्रतिपादित नहीं हो पायी। इसे स्पष्ट रूप में रेखांकित कर लेने की आवश्यकता है। सर्वशुभ का स्रोत सह-अस्तित्ववादी ज्ञान, विचार रूपी विज्ञान, विवेक ही है। इसे बहुत आसानी से समझ भी सकते हैं, समझा भी सकते हैं। जीने दे सकते हैं, जी भी सकते हैं हम हर व्यक्ति समझदारी की स्थिति गति में प्रमाणित हो सकते हैं, और लोगों को प्रमाणित होने के लिए प्रवृत्त कर सकते हैं। यही
समझदारी का लोकव्यापीकरण विधि है, सम्पूर्ण मानव का स्थिति गति में प्रमाणित होना। सम्पूर्ण स्थितियाँ सार्वभौमिक और अखंड समाज संबंध के रूप में स्पष्ट है।
इन सभी सोपानों में भागीदारी करना ही प्रमाण का तात्पर्य है। ऐसे प्रमाण मानव में, से, के लिए अनुभव मूलक विधि से परावर्तित होते हैं। ऐसे अनुभवमूलक प्रमाण सार्वभौम होते हैं, इसके लिए जीकर देखना ही एकमात्र उपाय है। मानव विज्ञान विधा में पारंगत होना चाहता है। पारंगत होने में अभी तक की प्रायोगिक, व्यवहारिक अड़चन यही दो मुद्दे में सिमटा। पहला, अंतिम सत्य का अता-पता नहीं हो पाया, दूसरा मूल मात्रा, ऊर्जा स्रोत व लक्ष्य का पता नहीं चल पाया, तीसरा - मानव का अध्यययन न हो पाना, चौथा - अस्तित्व का प्रयोजन स्पष्ट न हो पाना रहा।