- न्याय : संबंध सापेक्ष/ संबंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन, उभय तृप्ति।
- धर्म : व्यवस्था सापेक्ष/ सर्वतोमुखी समाधान = सुख = मानव का धारणा।
- सत्य : अस्तित्व सापेक्ष = सहअस्तित्व = व्यापक सत्ता में संपृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति। अ.व. (146-148)
अध्ययन विधि में न्याय, धर्म, सत्य का भास, आभास, प्रतीति (साक्षात्कार बोध) एवं अनुभव होना पाया जाता है। सत्य भास होने पर हम आगे चल देते हैं। साक्षात्कार में ही निरंतर रहने वाली वस्तु, अर्थात देश काल मुक्त वस्तु न्याय, धर्म, सत्य रूप में सार्वभौम वस्तुओं का निश्चय हो पाता है। यही स्वभाव धर्म ही है । साक्षात्कार होने के बाद ही बोध, अनुभव होता है। संवाद(2010)
प्रिय, हित, लाभ दृष्टि पूर्वक कोई भी मानव सामाजिक होना संभव नहीं है, व्यवस्था में जीना अति दुरूह रहता ही है। इसी अवस्था को भ्रमित अवस्था (जीव चेतना) के नाम से स्पष्ट किया गया। जागृतिपूर्वक मानव में न्याय, धर्म, सत्य, दृष्टि विकसित होती है। जागृतिपूर्वक मानव सामाजिक होता है और व्यवस्था में जीता है। हर मानव में, से, के लिये जागृति न्याय, धर्म, सत्य स्वीकृत है और वांछनीय है।
भ्रमवश विभिन्न समुदाय परम्पराएँ अपने-अपने सामुदायिक अहमता के साथ उनके परंपरा में आने वाले संतानों को भ्रमित करने का तरीका खोज रखे हैं। इसलिये हर परंपरा में आने वाले संतान पुनः पुनः भ्रमित होते आए।
यह काम बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक तक देखने को मिला। दसवें दशक में “अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित दृष्टिकोण” सम्पन्न कुछ लोगों में यह सुस्पष्ट हो गई कि विगत से परम्परा में प्राप्त शिक्षा-संस्कार भ्रम की ओर है। इससे छूटना आवश्यक है। यह सुस्पष्ट हो चुकी है कि मानव का दृष्टिकोण ही, विचार ही हर कार्यों का कारण है। विचारों का कारण दृष्टिकोणों के आधार पर ही निर्भर है। हर दृष्टिकोण मानव जीवन सहज जागृति क्रम, जागृति, जागृति पूर्णता और उसकी निरंतरता पर निर्भर है। इस प्रकार दृष्टि की क्रियाशीलता (न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि) जागृति का कारण सह-अस्तित्व ही है। इसी सत्यातावश हर मानव जागृति को प्रमाणित करने योग्य है। अस्तु, अस्तित्व सहज रूप में जागृति को प्रमाणित करना ही मूल कारण है।
भ्रम = जीव चेतना = प्रिय, हित, लाभ दृष्टि = समस्या = दुख
- जागृति = मानव चेतना = न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि = समाधान = सुख = अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण । अ.व. (234-237)
- जागृत जीवन सहज पाँचों बल और पाँचों शक्तियाँ अक्षय रूप में कार्यरत रहते हैं। इनके नित्य कार्यरत रहने में अस्तित्व में कोई बाधक तत्व नहीं है। अपितु अस्तित्व में हर वस्तु जीवन शक्तियों के अक्षय-कार्यकलाप के लिए अनुकूल रूप में ही विद्यमान रहते हैं। जैसे जागृत जीवन सहज कल्पना का अवरोधक तत्व कुछ भी नहीं है और अनुकूल तत्व सब