3.2 परिवार में व्यवस्था
3.2.1 व्यवहार में 7 प्रकार के संबंध :- दायित्व- कर्तव्य
मानव में परस्परताएँ में भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, माता-पिता, पति -पत्नी, चाचा-चाची, मामा-मामी आदि से सम्बोधन किये जाते है। ये परिवार सम्बोधन कहलाते है। इन सम्बोधन के साथ प्रयोजनो को (सम्बंध का अर्थ रूपी प्रयोजनो को) पहचानते हुए निर्वाह करने के क्रम में हम जागृत मानव कहलाते है। भ्रमित मानव भी सम्बोधनो को प्रयोग करता ही है। सम्पूर्ण प्रयोजन सम्बन्धो की पहचान और निर्वाह जैसे गुरू के साथ श्रद्धा-विश्वास, माता-पिता के साथ श्रद्धा-विश्वास, भाई-बहन के साथ स्नेह और विश्वास, मित्र के साथ स्नेह-विश्वास, पुत्र-पुत्री के साथ वात्सल्य, ममता, विश्वास, इसकी निरन्तरता में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित करते है। इन सभी सम्बंधो का निर्वाह करने के साथ दायित्व और कर्तव्य अपने आप स्वीकृत होते है।
दायित्व कर्तव्यों का निर्वाह होना अपने आप में विश्वास का आधार बनता है यही व्यवहार सूत्र कहलाता है। जहाँ भी कर्तव्य दायित्वो का निर्वाह नहीं कर पाते वहाँ विश्वास नहीं हो पाता है। (दूसरी विधि से, जहां दायित्व (जिम्मेदारी) और कर्तव्य (करना) नही है, वहाँ संबंध नही है, फलतः व्यवहार नही है।)
भ्रमित मानव परम्परा में दायित्व कर्तव्य का बोध नहीं हो पाता है। इससे स्पष्ट हो जाता है व्यवहार तंत्र का आधार सम्बंध ही है। इसका निर्वाह और निरंतरता ही परिवार और समाज की व्याख्या बन जाती है। इन दोनो प्रकार की व्याख्या से पारंगत होने के फलन में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी होना स्वाभाविक है। व्यवस्था में सार्वभौमता स्वभाविक है। व्यवस्था को हर व्यक्ति बरता ही है अखण्ड समाज व्यवस्था ही व्यवस्था हो पाती है। ज.व. (142-143)
संबंध एक क्रिया है। प्रयोजन के अर्थ में संबंध को पहचानना है। जबकि, अभी हमारे रूचि के अनुसार संबंध रहता है। संबंध का प्रयोजन जो है, व्यवस्था है व्यवस्था के अर्थ में संबंध को पहचानना है। संबंध को पहचानने से मूल्य अपने आप रहते हैं। अभी संबंध के ‘आकृति’ को मां मानते हैं जबकि संबंध एक क्रिया है। यह संबंध क्रिया के रूप में अपने आप के मां की आकृति है। इस ढंग से ‘अच्छा लगा बुरा लगा’ कि आधार पर जो अभी तक संबंधों में पीड़ित होते हैं, इस ढंग से उससे छुटकारा पाने का उपाय बनता है। संवाद(2013)
मानव समाज में परस्पर निम्न संबंध दृष्टिगोचर होता है :-
- 1. पिता-माता एवं पुत्र-पुत्री संबंध,
2. पति-पत्नी संबंध,
3. गुरु और शिष्य संबंध,