दिखाई पड़ती है और जीवों में अर्थात् “जीकर जीने देने” की प्रवृत्ति देखने में मिलती है। जैसे बड़ी मछली छोटे मछली को भक्षण करती है।
मानव में ही जीने देकर जीना सर्वाधिक सम्भावना, आवश्यकता, उसके लिए पर्याप्त स्रोत जीवन सहज अक्षय बल, अक्षय शक्ति के रूप में विद्यमान है। अ.श. (213-214)
2 - पति-पत्नी संबंध:-
दाम्पत्य जीवन की चरम उपलब्धि ‘एक मन और दो शरीर होकर’ व्यवहार करना है। दाम्पत्य जीवन में व्यवहार निर्वाह संपर्क एवं संबंध ही है। तात्पर्य यह है कि दाम्पत्य जीवन व्यक्ति के रूप में दो है और व्यवहार के रूप में एक हैं। एक मन और दो शरीर अनुभव करने के लिए दोनों पक्षों द्वारा निर्विरोध पूर्वक अपने संबंध एवं संपर्क का निर्वाह करना ही अवसर, आवश्यकता तथा उपलब्धि है। मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, आदर और यश पति अथवा पत्नी दोनों में सम्मिलित रूप से रहता है तथा उनमें से किसी एक को भी मिलने पर दूसरे पक्ष में वह समान रूप में बंटता ही है और इसकी स्वीकृति भी है। पति-पत्नी के रूप में दो शरीर एक मन होने का यही प्रमाण है।
सभी संबंधों में विश्वास मूल्य सदा-सदा होना परमावश्यक है। यही मूल मुद्दा है संबंधों को पहचानने का।
सभी संबंध अथवा स्थापित संबंध पहचान में होने के उपरांत शरीर काल तक निर्वाह होने की बात आती है। यही जागृत मानव परंपरा का प्रमाण है। संबंधों में से एक महत्वपूर्ण संबंध पति-पत्नी संबंध है। इस संबंध में परस्परता में मूल्यों का पहचान इस प्रकार से होता है कि विश्वास पूर्वक सम्मान, स्नेह व प्रेम मूल्यों का निरंतर अनुभव होता है या समय-समय पर होता है। न्यूनतम विश्वास मूल्य बना ही रहता है।
3. गुरु और शिष्य संबंध :-
गुरु की ओर से शिष्य के प्रति आशा बंधी रहती है कि जो अध्ययन कराया जाता है, उसका बोध शिष्य को होगा। शिष्य की गुरु से प्रत्याशा रहती है कि उसकी वांछा तथा जिज्ञासा के आधार पर उन्हीं दिशाओं में गुरु द्वारा अध्ययन कराया जाएगा। गुरु और शिष्य दोनों में उपलब्धि की कामना की साम्यता है। प्रक्रिया में पूरकता है। एक प्रदाता है और दूसरा प्राप्तकर्त्ता है। प्राप्तकर्त्ता और प्रदाता की एक ही अभिलाषा है कि ‘बोध’ पूर्ण हो जाये।
शिष्य का अर्थ बोध-पूर्ण हो जाता है, उस समय गुरु पर्व मनाता है अर्थात् गुरु को प्रसन्नता की अनुभूति होती है, जिसको वात्सल्य कहते हैं।