4. भाई और बहिन संबंध,

5. साथी-सहयोगी संबंध,

6. मित्र संबंध,

7. व्यवस्था और समग्र व्यवस्था संबंध।

1. पिता-माता एवं पुत्र-पुत्री संबंध:-

माता-पिता के संबंध में पुत्र-पुत्री के साथ मातृ-भाव में शरीर-भाव सहित मौलिकता प्रधान रहता है तथा पितृ संबंध में मूल्य और बौद्धिक जागृति प्रधान व पोषण सम्पन्न रहता है। मूल रूप में माता पोषण प्रधान तथा पिता संरक्षण प्रधान स्पष्ट है। माता पिता की पहचान हर मानव संतान किया ही रहता है। शिशुकाल की स्वस्थता का यह पहचान भी है। अतएव माता-पिता जिन मूल्यों के साथ प्रस्तुत होते हैं, वह ममता और वात्सल्य है। ममता मूल्य के रूप में पोषण प्रधान क्रिया होने के रूप में या कर्त्तव्य होने के रूप में स्पष्ट है। इसलिए मां की भूमिका ममता प्रधान वात्सल्य के रूप में समझ में आती है। ममता मूल्य के धारक-वाहक ही स्वयं में मां है।

अभिभावक सन्तान का अभ्युदय (सर्वोतोमुखी समाधान) ही चाहते हैं। कुछ आयु के अनन्तर इसका प्रमाण चाहते हैं। माता एवं पिता हर संतान से उनकी अवस्था के अनुरूप प्रत्याशा रखते हैं।

उदाहरणार्थ शैशवावस्था में केवल बालक का लालन पालन ही माता-पिता का पुत्र-पुत्री के प्रति कर्त्तव्य होता है तथा इस कर्त्तव्य के निर्वाह के फलस्वरूप वह मात्र शिशु की मुस्कुराहट की ही अपेक्षा रखते हैं। कौमार्यावस्था में किंचित शिक्षा एवं भाषा का परिमार्जन चाहते हैं। कौमार्यावस्था के अनंतर संतान में उत्तम सभ्यता की कामना करते हैं। सभ्यता के मूल में हर माता-पिता अपने संतान से कृतज्ञता (गौरवता) पाना चाहते हैं तथा केवल इस एक अमूल्य निधि को पाने के लिये तन, मन एवं धन से संतान की सेवा किया करते हैं। संतान के लिये हर माता-पिता अपने मन में अभ्युदय, समृद्धि तथा संपन्नता की ही कामना रखते हैं, इन सब के मूल में कृतज्ञता की वाँछा (कामना) रहती है।

जो संतान माता-पिता एवं गुरु के कृतज्ञ नहीं होते हैं, उनका कृतघ्न होना अनिवार्य है, जिससे वह स्वयम् क्लेश परंपरा को प्राप्त करते हैं और दूसरों को भी क्लेशित करते हैं।

परिवारमूलक स्वराज्य व्यवस्था क्रम में ही जीने देकर जीने का प्रमाण मानव कुल में हो पाता है। इसे भ्रमित परंपरा में भी संवेदना के रूप में होना देखा गया है। एक माँ अथवा पिता सीमित साधनवश खाने के अत्यल्प आहार होने की स्थिति में सर्वप्रथम अपने संतान को पहले आहार देकर बचा हुआ को ही ख्राना चाहेंगें। इसमें समता मूल्य विश्वास क्रियाशील रहने के फलस्वरूप ऐसा आचरण अभिभावकों में होना देखने में आता है। अभिभावक का परिभाषा है “अभ्युदय के अर्थ में संतान को स्वीकारा है।“ जागृत मानव कुल में “जीने देकर जीने” की प्रवृत्ति चिन्हित रूप में

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