तात्पर्य यह है कि हर एक बड़े अपने से छोटों में वांछित गुणों की प्रसारण क्रिया में तत्पर रहते हैं। इसके बदले में जो तोष (उत्सवित होना) वे पाते हैं, वही इसकी उपलब्धि है। प्रदाय के बदले में किसी भौतिक वस्तु की प्राप्ति की अभिलाषा नहीं रहती। जैसे-जैसे शिष्य का आकाँक्षा और जिज्ञासा शांत होता है, वैसे ही सभी संशय दूर होते जाता है। ऐसे संशय मुक्ति विधि से गौरव, श्रद्धा, कृतज्ञता मूल्य शिष्य में गुरु के लिए अर्पित होना पाया जाता है। इस प्रकार गुरु शिष्य में मूल्यों का मूल्यांकन पूर्वक उत्सवित होना स्वाभाविक होता है।
4. भाई और बहन संबंध -
भाई और बहन के संबंध को सौहार्द्र (आदर)-भाव के नाम से जाना जाता है। इसमें परस्पर जागृति की प्रत्याशा एवं उत्साह है भाई-बहन की पहचान एक निश्चित आयु में हो पाती है। पहचान होते ही परस्परता में सच्चाई, समझदारी और परिवार सम्मत अथवा जागृत मानव परिवार सम्मत अपेक्षा के अनुसार, कौमार्य अवस्था में आज्ञापालन सहयोग और अनुसरण जैसे कार्यों में परस्पर मूल्यांकन होना पाया जाता है। यही मित्रों के साथ भी होता है। जब भाई-बहन इन मुद्दों पर मूल्यांकन करने लगते हैं तब भी अभिभावक और गुरुजनों के साथ आज्ञापालन संबंध रहता ही है। अनुसरण भी इन्हीं दो पक्षों से जुड़ा रहता है। मूल्यांकन में ये सब बात स्पष्ट होना स्वाभाविक रहता है।
जहाँ तक सहयोग की अभिव्यक्ति है, इसमें एक दूसरे को अधिकाधिक सटीकता की और विचार अथवा प्रकाशित होने की संभावना बनी ही रहती है।
कौमार्य और युवावस्था के बीच भाई-बहन, भाई-भाई, बहन-बहन; के परस्परता में अनुशासन की बात आती है। अनुशासन आज्ञा पालन के क्रम में एक पक्षीय हो पाते हैं। अनुशासन गुरुजनों व अभिभावकों से जीने में प्रमाणित रहने के आधार पर, अनुशासन बोध संतानों में होना स्वाभाविक है। इस विधि से कार्य-व्यवहार विचार सम्पन्न होते हुए भाई-बहन-मित्र संबंधों में विश्वास पूर्वक सम्मान व मूल्यांकन पूर्वक परस्परता में स्नेह मूल्य को सदा-सदा प्रमाणित करना होता है। इस विधि से इन संबंधों में विश्वास, सम्मान, स्नेह मूल्य प्रधान रहता है साथ ही प्रेम मूल्य स्पष्ट होना भावी रहता है।
5. साथी-सहयोगी संबंध(उत्पादन कार्य में संबंध):-
एक दूसरे के लिए पूरक विधि से सार्थक होना पाया जाता है। यह संबंध सहयोगी (सेवक) की कर्त्तव्य निष्ठा से व साथी के दायित्व निष्ठा से सार्थक होना पाया जाता है। यह परस्पर पूरक संबंध है। इनमें मूल मुद्दा दायित्व को निर्वाह करना, कर्त्तव्यों को पूरा करने में ही परस्परता में संगीत होना पाया जाता है। यह जागृत परंपरा की देन है। इसमें मुख्यत: विश्वास मूल्य रहता ही है। गौरव, सम्मान, स्नेह मूल्य अर्पित रहता है।