इस ढंग से विज्ञान में इतना लम्बी चौड़ी निष्ठा से प्रयोग करने के उपरान्त भी सभी स्पष्ट रूप से जीना चाहने वाले कुंठित हो बैठे।

इस मुद्दे पर पहले यह तय हुआ कि भौतिकवादी विधि से अथवा आदर्शवादी विधि से विज्ञान के सामने जितने भी दावे आते हैं अर्थात् प्रश्न चिन्ह आते हैं, उसे आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक ध्रुवों के आधार पर हल करने का प्रयास किया जाय। परन्तु इस आधार पर कोई सार्थक दृष्टि के अनुसार तर्कसंगत और प्रयोजन संगत कार्य व्यवहार, व्यवस्था परंपरा को स्थापित नहीं कर पाया। इसकी अपेक्षा शुभ चाहने वाले, दूसरी भाषा में सर्वशुभ चाहने वाले हर नर-नारी, में ऐसी चाहत पायी जा रही है।

दूसरी ओर कुंठित होने वाली बात स्पष्ट हो चुकी है। कुंठित होने वालों में भी बहुत से लोग सर्वशुभ चाहते ही होंगे।

शुभ चाहने वाली विधि से तर्क संगत करने जाते हैं तो सर्वशुभ ही ध्रुव होता है। अब यहाँ सर्वशुभ की चाहत को सर्व मानव की स्वीकृति अथवा सर्वाधिक की स्वीकृति मानते हुए, आगे और सोचने, समझने, प्रमाणों को प्रस्तुत करने के क्रम में इस आलेख को आगे बढ़ाया है। इस बात का उल्लेख अवश्य है कि हम मानव परिभाषा के रूप में मनाकार को साकार करने वाले हैं और मनःस्वस्थता को प्रमाणित करने में प्रचलित शिक्षा-विधि से असमर्थ रहे हैं।

मनःस्वस्थता ही मानव की मौलिकता है इस मौलिकता को प्रमाणित करने के क्रम में ही मानव सुखी होने के तथ्य को हम अपने में जांच कर प्रमाणित कर चुके हैं। यह सह-अस्तित्व विधि से सफल है।

हर विधा में हम समाधानपूर्वक जीकर ही सुखी होते हैं। समाधान पूर्वक जीने का सूत्र समझदारी पूर्वक ही सार्थक होना पाया गया। समझदारी सहअस्तित्व पूर्ण दृष्टिकोण से सम्पन्न होता है। यह तो पहले से अभी तक प्रस्तुत किया गया अध्ययन से विदित हो चुका है कि आदर्श वादी विधि, भौतिक वादी विधि से, तार्किक विधियों से समझदारी प्रमाणित नहीं हो पाती। प्रस्तावित सहअस्तित्व वादी विधि से ही, अनुभव मूलक विधि से हर नर-नारी समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और भागीदारी के रूप में मानवीय आचरण पूर्वक सर्वतोमुखी समाधान को प्रमाणित कर सकते हैं।

स्वयं में सदा-सदा सुख का अनुभव कर सकते हैं क्योंकि सार्वभौम समाधान सम्पन्न होना ही समझदारी की सर्वप्रथम सीढ़ी है।

हर जागृत मानव में यह विद्यमान रहता ही है। इसी कारणवश सदा-सदा सुखी होने की संभावना भी समायी रहती है। सह-अस्तित्व विधि से स्पष्ट न होने वाली कोई वस्तु ही नहीं है। सम्पूर्ण वस्तु को जो समझने योग्य है, समझता है, समझा गया भी है। भ.व. (113-117)

Page 11 of 130
7 8 9 10 11 12 13 14 15