जब इस संसार में मानव से पुछा जाये कि “आप सही चाहते है या गलत?” तो हर व्यक्ति सही के पक्ष में ही सहमति प्रदान करता है। साथ ही सही और गलत क्या है? - यह पूछने पर यह उत्तर निकलता है कि सही का संक्रमण बिन्दु या सीमा रेखा स्पष्ट नही है। यह पूर्ववर्ती दोनों विचारधाराओं के अनुसार प्राप्त तर्क का स्वरूप है।
सही और गलत का संक्रमण बिन्दु अथवा सीमा रेखा जागृत मानव को समझ में आता है। भ. व. (129 )
जब कि प्रौद्योगिकी विधा से गुजरता हुआ आज का मानव भय-प्रलोभन के स्थान पर न्याय की आवश्यकता पर ध्यान देने योग्य हुआ। क्योंकि प्रौद्योगिकीय कार्यवाही क्रम में समृद्ध, संतुलित धरती का शक्ल बिगड़ गयी। युद्ध सम्बन्धी आतंक परस्पर समुदायों में पहले से ही रहा। उसी के साथ-साथ धरती और धरती के वातावरण सम्बन्धी असंतुलन का भय और धीरे-धीरे गहराता जा रहा है। इसी के साथ-साथ जनसंख्या बहुलता, मानव चरित्र और प्रौद्योगिकी के योगफल में अनेकानेक रोग और विपदाओं का सामना करता हुआ वर्तमान में मानव कुछ प्रतिशत विद्वान, मनीषी विकल्प के पक्षधर हैं या आवश्यकता को अनुभव करते हैं। इसी बेला में विकल्प की सम्भावना समीचीन हो गया।
ये तो सर्वविदित है कोई भी अनुसंधान-अध्ययन विधि पूर्वक प्रस्तुत होने पर शिक्षा संस्थाओं के माध्यम से लोकव्यापीकरण की आशा की जाती है।
अध्ययनकारी विधि को इस प्रकार सोचा गया है कि तर्क संगत प्रणाली सत्य समझ में आने के विधि, संगीतीकरण की अपेक्षा अभी तक की अध्यवसायिक मन:पटल में आ चुकी है। यह भी मान्यता है – “सत्य है।” सत्य क्या है? इसका उत्तर अभी तक शोध के गर्भ में ही निहित है। अतएव विकल्प के रूप में अस्तित्वमूलक, मानव केंद्रित चिंतन प्रस्ताव के रूप में मानव सम्मुख प्रस्तुत हुआ है। अ.श. (128-129)
विकल्प मध्यस्थ दर्शन के अनुसार :-
1. सर्वमानव को न्याय चाहिए, न कि फैसला।
2. सर्वमानव को व्यवस्था चाहिये, न कि शासन।
3. सर्वमानव को समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व चाहिये न कि अतृप्ति से ग्रसित संग्रह, सुविधा एवं रहस्य।
ऐसा न्याय,व्यवस्था, समाधान संभव है या नही? इस अध्याय पर इसी पर चर्चा है, संभावना प्रस्ताव की प्रस्तुति है।
“अस्तित्व में व्यवस्था है, भ्रमित मानव ही समस्या पैदा कर्ता है” - ज.व
मानाव ही ऐसी इकाई है जो प्राकृतिक सहज क्रियाकलापों में हस्तक्षेप करता है, फलत: ह्रास विधि ज्ञान को विज्ञान कहना बनता है। यथा- मेंढक, सांप, आदमी, परमाणुओं को काटो, धरती को काटो-उड़ाओ ये सब कल्पनाएं मानव में होता है। अपनी कल्पनाओं के अनुसार प्रयोग करने का अधिकार मानव में होता है। इन्हीं प्रयोगों के चलते मानव को अथवा हर भ्रमित मानव को अव्यवस्था में जीने की विवशता को भी स्वीकार करता है। यही सर्वदृष्टिगोचर घटना