पर वस्तुओें का निर्माण कार्य किये जैसे आहार, आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरदर्शन, दूरगमन वस्तुओं का मानव निर्बाध रूप से उत्पादन करने योग्य हो गये। इस क्रम में मानव अपने आश्वस्ति की जगह पहुंचने तक इन प्रौद्योगिकी विधाओं में प्रयुक्त ईंधन से उर्जा ग्रहण किये और उसके अवशेष धरती, जल और वायु को प्रदूषित कर दिया। स.श. (94-99)

उत्पादन की परिभाषा: समृद्धि के अर्थ में प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम पूर्वक स्थापित उपयोगिता एवं कला मूल्य ही उत्पादन है।

मानव परंपरा में केवल “वस्तु मूल्यों” के साथ ही जीना संभव नहीं है। जबकि भ्रमवश सर्वाधिक लोग वस्तुओं भौतिक वस्तु, सुविधा संग्रह के साथ ही जीकर सुखी होने का प्रयास कर रहे हैं, किए हैं किन्तु सुखी होने का साक्ष्य मिलता नहीं है। सुखी होने की अभिलाषा हर व्यक्ति में समीचीन है अथवा हर व्यक्ति में बनी हुई है। सुख का स्वरूप मानवीयतापूर्ण आचरण है। मानवीयतापूर्ण आचरण में मूल्य, चरित्र और नैतिकता आवर्तनशीलता और उसका संतुलन ही तृप्ति और सुख है। मूल्यों का स्वरूप जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य और वस्तु मूल्य के रूप में है। अ.श. (143)

इस ढंग से समझ में आता है, उत्पादनपूर्वक यथा निपुणता, कुशलतापूर्ण जीवन शक्तियों को हस्त लाघव सहित (शरीर के द्वारा) प्राकृतिक ऐश्वर्य पर स्थापित करने की क्रियाकलाप को उत्पादन कार्य नाम है। यह प्रसिद्ध है। सबको विदित है। ऐसे उत्पादित वस्तुओं को दूसरे से उत्पादित किया गया वस्तु को पाने के क्रम में हस्तांतरित कर लेना अर्थात् लेन-देन कर लेना मानव कुल में एक आवश्यकता है। यही मूलत: विनिमय के नाम से जाना जाता है। अ.श. (136-137)

विनिमय कोष

वर्तमान में इस धरती पर मानव परंपरा में लेन-देन का जो क्रियाकलाप है पत्र मुद्रा (पैसा) पर आधारित है। प्रतीक मुद्रा के रूप में छपे कागज पर एक से हजारों की संख्या लिखी रहती है और उसी के आधार पर उस मुद्रा (नोट) का मूल्य माना जाता है। ऐसे सभी कागज (नोट) वस्तुओं के अनुपलब्धता की स्थिति में एक व्यक्ति के लिए अनाज या एक व्यक्ति की प्यास बुझाने का कार्य नहीं कर सकते। आरंभिक समय में धातु मुद्रा (जैसे सोना, चांदी के सिक्के) का प्रचलन स्थापित होना इतिहास में भी अंकित है। धातुओं पर लिखे गये संख्यात्मक मूल्यों के आधार पर वस्तुओं का विनिमय आरंभ हुआ। यहाँ उल्लेखनीय घटना यही है ‘इसके पहले वस्तु विनिमय प्रणाली जब स्थापित हुई तब धातु मुद्रा चलन के साथ भी श्रम-मूल्य का मूल्यांकन, उसकी प्रणाली, पद्धति, नीति स्थापित नहीं हो पायी।’ अ.श. (10)

Page 97 of 130
93 94 95 96 97 98 99 100 101