इस ढ़ंग से हर मानव संतान बाल्यकाल से ही सत्य वक्ता होना आकलित होता है। जबकि सत्यबोध उनमें रहता नहीं है। शब्दों को बोलना ही बना रहता है। इससे यह भी पता लगता है मानव परम्परा का दायित्व है कि मानव संतान को सत्य बोध करायें। इसी के साथ सही कार्य, व्यवहार का प्रयोजन बोध सहित पारंगत बनाने की आवश्यकता है। न्याय बोध हर संतान को कराने का दायित्व परम्परा के पक्ष में ही जाता है। इस ढंग से बच्चों के लिए प्रेरक साहित्यो, कविताओ की रचना करने के लिए ये तीनों सार्थक प्रवृतियाँ है। मानव में प्रवृतियाँ प्रयोग और परीक्षण बहुआयामो में होना देखा गया है। ये सब जन चर्चा के लिए बिन्दुएं है। इसका निरीक्षण विधि से सोच समझ विधि से संवाद होना मानव के लिए शुभ है। ज.व. (64-65)

“न्याय का याचक” होने का परीक्षण इस प्रकार किया गया है कि समान आयु के चार बच्चे हों, एक-एक फल दें, उसमें ज्यादा देर तक उनमें संतुष्टि का होना देखा जाता है। उनमें से कोई एक जल्दी खाले अथवा गुमा दे, तब दूसरे के हाथ वाले की ओर देखने और दौड़ने-पाने की इच्छा को व्यक्त करने की बात किसी-किसी में होता है, किसी में नहीं होता है। ज्यादा से ज्यादा 40% में होता है। इसे 10 बच्चों के बीच में देखा गया है। तीसरे स्थिति में 10 में से किसी एक को दो फल दे दिया उस स्थिति में बाकी 9 में से कोई न कोई उनको भी 2 फल होने की इच्छा व्यक्त करते हैं, क्रम से सभी में आता है। चौथे स्थिति में देखा गया है कि 10 में से 9 को फल दिया गया और एक को नहीं दिया गया उस स्थिति में रोते हुए या छीनते हुए देखा गया।

इस प्रकार से विविध विधिपूर्वक अध्ययन किया गया। सार संक्षेप में हर बच्चा न्याय चाहते हैं इसी बात की पुष्टि होती है। किसी को न देने पर भी, किसी को ज्यादा देने पर भी परेशानी बढ़ती है।

इससे निष्कर्ष में यही निकलता है हम किसी को वस्तु नहीं दिया, हमारे द्वारा ही किया गया अन्याय बच्चों को घायल करता है। इसीलिये बच्चे न्याय का याचक हैं। किसी के हाथ में दो फल दिये हैं यह भी हमारे ही द्वारा किया गया अन्याय है। हमारे अन्याय के प्रति सम्मति बाकी नौ बच्चे को नहीं हो पाता है उसके व्यथा को भाँति-भाँति से व्यक्त करते हैं। इसी प्रकार से कपड़े या खिलौने आदि किसी भी आधार पर सर्वेक्षण किया जा सकता है।

यह भी हम अध्ययन किये हैं हर बच्चे न्याय का अपेक्षा रखते हुए सही कार्य-व्यवहार करने का इच्छुक है।

इसे इस प्रकार से देखा गया है कि अभिभावक (माता, पिता, संरक्षक, पोषक और बच्चों से प्यार करने वाले जितने भी वयस्क व्यक्ति होते हैं) उन सबका मार्गदर्शन को और भाषा को सीखा करते हैं। इससे पता लगता है कि जितने भी सिखाने वाले वयस्क और प्रौढ़ व्यक्ति जो कुछ भी सिखाते हैं उसको बच्चे सीखते ही हैं। उनमें से जिन-जिन मुद्दे पर बच्चे विश्वास करते हैं उन्हें बराबर निर्वाह करते हैं। जिन-जिन पर शंका होती है उन पर अपनी कल्पनाशीलता को प्रयोग करते हैं। इससे पता चलता है कि सही कार्य-व्यवहार करने के इच्छुक हैं।

बच्चों में यह भी पाया गया है कि हर मानव संतान जब से बोलना आरंभ करता है, जो देखा, सुना रहता है उसी को बताने का प्रयत्न करता है और बताता है।

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