देखा हुआ वही रहता है जहाँ वह शरीर यात्रा को आरंभ करता है वहीं के घर-द्वार, आदमी, कुत्ता, बिल्ली, बड़े बच्चे, आकाश, धरती, सड़क ये सब देखा ही रहता है। घर के सभी सदस्यों को पहचाना ही रहता है। इस विधि से बताने की सामग्री हर बच्चे में बोलने के पहले से बना ही रहता है। इससे पता चलता है कि अभिभावक, प्रौढ़, बुजुर्ग, उनके जितने भी पुरूषार्थ कार्यकलाप, सम्भाषण, विशेषकर दृश्यमान जो देखे रहते हैं, श्रुतिमान जो सुने रहते हैं, सत्यवक्तता का आधार होना पाया जाता है। जैसे-जैसे बड़े होते हैं भाषा कोई सत्य नहीं है यह पता लगता है। भाषा से इंगित कोई वस्तु होना चाहिये इस मुद्दे पर जब जूझना शुरू होता है तो परम्परा विविध मुद्रा से प्रस्तुत होता है।

फलस्वरूप अपने मनमानी अथवा परंपरा की रूढ़ियों के अनुसार चलता है। पुनः अपने ही संतान को ऐसा कुछ विरासत में दे जाता है।

पहले यह भी स्पष्ट किया गया है राजगद्दी परम्परा से, धर्मगद्दी परंपरा से, शिक्षा गद्दी परंपरा से और व्यापार गद्दियों से सत्य सहज निष्कर्ष न निकलना ही मुख्य बात है पुनर्शोध का। इसी प्रकार धर्म और सत्य का मूल रूप किसी मानव संतान को समझ में न आकर रूढ़ियों के तहत अथवा किसी न किसी रूढ़ि के तहत अपने को समेट लेता है। शिशुकालीन देखी हुई, सुनी हुई सत्य वक्तव्य समय के अनुसार बदलते हुए स्थितियों को देखकर सत्य सदा ही अर्थ विहीन पीड़ा का कारण बना ही रहा। ऊपर कहे अनुसार सत्य संबंधी पीड़ा और अपेक्षा के साथ-साथ मानव जाति पीढ़ी से पीढ़ी, सदी से सदी, युग से युग बीतता-बीताता इस धरती पर यात्रा मोड़ अब ऐसी पेचीदा हो गई है जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है।

इस धरती पर आदमी को रहना है युगों सदियों तक, तब सत्य सहज वैभव को समझना और समझाना ही होगा। अन्यथा इस धरती पर रहना ही नहीं होगा।

वर्तमान परिस्थिति से तृप्ति सर्वसुलभ होने की स्थिति बन नही पायी। इससे सुस्पष्ट है मानव-मानव को, अस्तित्व को, जीवन को, जागृति को न समझते हुए भी विद्वता का अर्थात् ज्ञानी-विज्ञानी होने को स्वीकार करता रहा। उक्त चारों मुद्दें से इंगित तथ्य अभी तक न तो शिक्षा में आया है, न तो शिक्षा में प्रचलित है, न ही व्यवहार में मूल्यांकित है, इतना ही नहीं राज्य संविधानों में और धर्म संविधानों में उल्लेखित नहीं हो पाया है। व्याख्यायित-सूत्रीत नहीं हो पाया है। इन गवाही के साथ उपर किया गया समीक्षा स्पष्ट हो जाता है।

जीवन, जीवन जागृति, सह-अस्तित्व और मानव के अध्ययन के उपरान्त ही जीवन और जागृति सर्वमानव में, से, के लिए समानता का तथ्य लोकव्यापारीकरण होना दिखाई पड़ती है। यहाँ समझने का तात्पर्य समझाने योग्य परंपरा से ही है। शिक्षा-संस्कार परंपरा ही इसके लिए प्रधान रूप में उत्तरदायी है।

उत्पादन कार्य

मानव, मानव के साथ जो भी करता रहा उसका “व्यवहार” नाम हुआ और मानवेतर प्रकृति के साथ जो किया वह सब “उत्पादन कार्य” कहलाया। व्यवहार व उत्पादन कार्यो का निश्चित, चिन्हित क्षेत्र स्पष्ट हो गया है। जितनी भी समस्याएँ उत्पादन विधा में बनी रही उनका निराकरण उपाय खोजते रहे और मानव की आवश्यकताओं के आधार

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