परिणाम का अमरत्व, गठनपूर्ण परमाणु में स्पष्ट होता है। यह परमाणु में विकास का एक सोपान है। ऐसे जीवन ही मानव शरीर द्वारा जागृति को प्रमाणित करने के क्रम में श्रम का विश्राम को मानव चेतना के रूप में स्पष्ट कर देता है। इसका प्रमाण समाधान = विश्राम = जागृति है। इस विधि से श्रम का विश्राम अर्थात् समाधान पद में ही मानवीयता पूर्ण समाज और व्यवस्था अपने अखंडता और सार्वभौमता के साथ वैभवित होना समीचीन है। ऐसी जागृतिपूर्वक परंपरा स्थापित होना और उसकी निरंतरता होना ही वैभव का तात्पर्य है। - अ.श. ४८

प्रत्येक मानव सहज रूप में समाधान को स्वीकारता है न कि समस्या को क्योंकि समाधान सुख के रूप में ही होना समझ में आता है। अस्तु मानव व्यवस्था में जीने, व्यवहृत होने के फलस्वरूप ही नित्य समाधान अक्षुण्ण रहना पाया जाता है। ऐसी जागृत परंपरा ही जीवन में क्रियापूर्णता का साक्ष्य है। इनकी महिमा क्रम में जीवन में जागृति पूर्णता का होना जिसका कार्यरूप अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान सहज नित्य अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन पूर्वक प्रमाणित होना देखा जाता है। जागृति पूर्णता प्रत्येक मानव में अपेक्षित है। इसे जागृति पूर्ण पद के रूप में पहचाना गया है। यही पद है सम्पूर्ण भ्रमों से मुक्त पद। इसी पद में मानव ही देव मानव, दिव्य मानव के रूप में अपने ज्ञान-दर्शन-आचरण पूर्वक सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करता है। ऐसे देवमानव दिव्यमानव पद में सर्वाधिक उपकार होना समीचीन है। उपकारी का तात्पर्य है उपाय पूर्वक जीवन जागृत कार्य-व्यवहार में पारंगत और समर्थ होने में सहायक होने से है। इस पद को आचरणपूर्णता नाम से संबोधित किया है। इस प्रकार परिणाम का अमरत्व (गठनपूर्णता), श्रम का विश्राम (क्रियापूर्णता) और गति का गंतव्य (आचरणपूर्णता) ही सह-अस्तित्व में परमाणु सहज विकास होने के अनन्तर जीवन लक्ष्य होना, सार्थक होने का तथ्य अध्ययनगम्य है। इस प्रकार इस धरती में भ्रमात्मक मानव समुदायों से निर्भ्रम मानव, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था एवं मानव परंपरा वैभवित होने का अध्ययनगम्य रूप में प्रस्तुत है। - अ.श. (2001) २८-३३

जीवन जागृति, जीवन-विद्या बोध होने के उपरान्त है। यह जीवन क्रिया कलापों के अंतर्सम्बन्ध को, परस्पर जीवन प्रभाव क्षेत्र अनुबन्ध क्रम से स्पष्ट करता है। निरीक्षण, परीक्षण विधिपूर्वक अभ्यास से, दृष्टा पद प्रतिष्ठा सहज ही प्रमाणित होता है। - स.श. 154

(*अर्थात्) जागृति जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के क्रम में है। यह व्यवहार में स्पष्ट होता है। सर्वप्रथम चयन और आस्वादन में जागृति, दूसरा विचार (विश्लेषण) और तुलन में जागृति। तीसरा चिंतन और चित्रण में जागृति। चौथा बोध और संकल्प में जागृति। पाँचवें चरण में परम तृप्ति की अनुभूति और उसका प्रामाणिकता। मानवीयता व्यवहार में प्रमाणित होना ही जीवन जागृति सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन है। यही दूसरी भाषा में जागृति सहज अनुभव बल, विचार शैली तथा जीने की कला है। यही मानव परंपरा की मूलपूंजी है। जागृति सहज वैभव ही मानवीयतापूर्ण परंपरा का वैभव है। इसलिए मानव परंपरा का जागृत होना, जागृत रहना सर्वोपरि एवं अनिवार्य है। - भ.व. ३२०

Page 107 of 335