के रूप में देखना सबके लिये सुलभ है। मानव में व्यक्त होने वाली संपूर्ण गतियाँ, प्रवाहित होने वाले आशा, विचार, इच्छा, सहित किये जाने वाले कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित क्रियाकलाप ही हैं। - स.श. 60-61
जीवन प्रत्येक व्यक्ति में समान रूप से क्रियाशील रहना पाया जाता है। इसके लिए अध्ययन वस्तु करने वाला मानव है। मानव के अध्ययन क्रम में सर्वप्रथम हम कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को देख पाते हैं। कल्पनाशीलता का उपयोग विविध विधि से होता हुआ कर्म स्वतंत्रता सहज कार्य-विन्यास गति में सर्वेक्षित होना पाया जाता है। इसके साथ परीक्षण-निरीक्षण एक आवश्यकता बनी रहती है। आबाल, वृद्घ, गरीब-अमीर, ज्ञानी-अज्ञानी, विद्वान और मूर्ख सभी व्यक्तियों में कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता संप्रेषित होता हुआ देखने को मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि सभी मानव में यह समान रूप से विद्यमान है। समानता के मुद्दे में मानव का ध्यान मात्रा और गुणों के ओर दौड़ना स्वाभाविक है। यह जीवन का ही एक अपेक्षा है साथ ही कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता जीवन सहज गति स्वरूप होना पाया जाता है। तथापि जीवन अपने मात्रा सहित ही वैभवित है। ऐसी मात्रा को एक गठनपूर्ण परमाणु के रूप में जाना गया है और माना गया है। फलस्वरूप जीवन के क्रियाकलापों को पहचानना संभव हो गया है। -आ.व. 32-37
(i) कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता
जीवन का अध्ययन संपन्न करने के क्रम में कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य में पहचानना और पहचान कराने की विधाओं में स्पष्ट किया जा चुका है।मनुष्य कितना भी कल्पना करे उसमें कल्पना धाराएं निर्गमित होती ही हैं। इससे यह पता लगता है कि कल्पनाशीलता हर व्यक्ति में अक्षय रूप में है।
(ii) चयन-आस्वादन
कल्पनाशीलता के अनन्तर प्रत्येक मानव चयन, आस्वादन करता हुआ देखने को मिलता है। चयन पहचान पूर्वक ग्रहण करने और उसका आस्वादन अपने ही इच्छापूर्ति के लिए सम्पन्न करता हुआ देखने को मिलता है। इससे पता लगता है कि चयन करने के अनन्तर आस्वादन, आस्वादन के अनन्तर पुन: चयन क्रिया आवर्तनशील विधि से सम्पन्न होता हुआ देखने को मिलता है। यह क्रिया कितना भी करें और करने के लिए यथावत् चयन-आस्वादन क्रिया उद्गमन बना ही रहता है। इसके साथ यह भी पता लगता है चयन आस्वादन करने का जीवन सहज शक्तियों का उद्गमन होता रहता है।