“चैतन्य प्रकृति का परावर्तन ही व्यवहार एवं उत्पादन, उसका प्रत्यावर्तन ही अनुभूति है।“- अ.द, १६२
मानव जागृति पूर्वक स्थिति-गति में प्रमाणित होना चाहता है। ऐसे प्रमाण स्वयं के भी और सम्पूर्ण के भी संबंध में आशित हैं। सर्वप्रथम इस सिद्घान्त को हृदयंगम करना होगा कि स्थिति, गति अविभाज्य है। ‘होना’, ‘गतित रहना’ इसका मूल प्रमाण है। एक परमाणु भी होने के आधार पर गतित रहता है। ग्रह गोल भी होने के आधार पर गतित रहता है। सम्पूर्ण पदार्थ संसार ‘होने’ के आधार पर ही रचना विरचना रूपी गति को बनाये रखता है। सारे वनस्पति भी होने के आधार पर ही, पुष्टि के रूप में गतित रहते हैं। संपूर्ण जीव संसार भी होने के आधार पर ही गतित रहता है। मानव जागृति होने के आधार पर ही गति को प्रमाणित करता है। इस प्रकार सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व में नित्य प्रतिष्ठा प्राप्त संपूर्ण वस्तु स्थिति-गति के रूप में वर्तमान है। इस विधि से संपूर्ण स्थिति-गति अविभाज्य है। स्थिति में बल, गति में शक्ति अथवा स्थिति को बल, गति को शक्ति के रूप में देखा जाता है और बल और शक्ति अविभाज्य है ही। -क.द. 112-113
जीवन में परावर्तन, प्रत्यावर्तन क्रिया संपादित होती है। इसे प्रकारान्तर से प्रत्येक व्यक्ति में, निरीक्षण, परीक्षण पूर्वक, अध्ययन किया जा सकता है। यही क्रिया अर्थात् निरीक्षण-परीक्षण क्रिया सार्थक हो पाती है।
स्व-निरीक्षण विधि, प्रत्यावर्तन को, और पर-निरीक्षण विधि परावर्तन को प्रमाणित करती है।
चयन-क्रिया अर्थात् ग्रहण करने का क्रियाकलाप परावर्तन विधि से और आस्वादन क्रिया प्रत्यावर्तन विधि से, स्वयं में संपन्न होती है।
- विश्लेषण क्रिया परावर्तन विधि से और तुलन क्रिया (प्रिय, हित, लाभ, न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि) प्रत्यावर्तन विधि से संपन्न होती है।
- चित्रण क्रिया परावर्तन विधि से इच्छा पटल में चित्रित हो पाती है। परावर्तन में रचनाओं, क्रियाओं के रूप में प्रमाणित हो पाता है और चिन्तन-क्रिया साक्षात्कार विधि से सार्थक होती है।
- साक्षात्कार की सम्पूर्ण वस्तु जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य और वस्तु-मूल्यों के रूप में द्रष्टव्य है। मूल्यों का संतुलन तुलन होकर, तृप्ति विधि में संलग्न रहता है। इस प्रकार साक्षात्कार की तृप्ति का स्रोत मूल्य हैं और उसकी (मूल्यों की) निरंतरता का भावी होना, पाया जाता है।
- जीवन में संपन्न होने वाली अवधारणा बोध-बुद्धि सहज प्रत्यावर्तन क्रिया है। सभी अवधारणाएं, अध्ययन अथवा अनुसंधान विधि से स्थापित हो पाती हैं। अनुभव मूलक विधि अनुभवगामी पद्धत्ति से, बोध होना पाया जाता है।
- अनुभव सत्य बोध कराने में प्रमाणित होता है और
- संकल्प, पूर्णता के अर्थ में, कल्पनाओं को गति देने से है।