अर्थात् जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान पूरकता विधि से आवर्तनशील है। - अ.श. (2001) २८-३३

(vi) अनुभव प्रामाणिकता

जीवन ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान तथ्यों सहज विधिवत् अध्ययनपूर्वक बोध होना देखा गया है। ऐसे बोध सहज तथ्यों को उद्घाटित करने के क्रम में और लोकव्यापीकरण करने के क्रम में प्रमाणित होते ही है। फलस्वरूप अनुभूत भी होते हैं। इस प्रकार नित्य प्रमाण और अनुभव सहज रूप में ही सम्पन्न होता हुआ देखा गया है। यही कैवल्य और जागृति की महिमा है। - आ.व. 260

अनुभव और प्रामाणिकता का वैभव न्याय, धर्म और सत्य रूपी वस्तुओं को अस्तित्व में नित्य वर्तमान रूप में समझने और समझाने की क्रियाकलाप, बोधगम्य रूपी वस्तुओं का संप्रेषणा और अभिव्यक्ति होना पाया जाता है।

(*इस ढंग से) सम्पूर्ण समझ चिन्तन, बोध, संकल्प, अनुभव और प्रामाणिकता के रूप में वैभवित रहता ही है। इसमें से चिन्तन, बोध, अनुभव जीवनगत गरिमा है और स्थिति है। प्रामाणिकता ऋतम्भरा ये महिमा है गति है। इस विधि से हमें स्वयं के प्रति निष्कर्ष यही समझदारी अर्थात् जानना-मानना-पहचानना-निर्वाह करने में पूर्ण जागृति ही हमारे तृप्ति का नित्य स्रोत है। जाने हुए को मानना अर्थात् स्वीकारना ही इमानदारी का स्वरूप है। जानने मानने के आधार पर संबंधों को पहचानना ही जिम्मेदारी है। निर्वाह करना ही अर्थात् समझा हुआ के अनुरूप निर्वाह करना ही भागीदारी का परिभाषा है, जो स्वयं इमानदारी का ही प्रमाण है। समझे बिना जो कुछ निर्वाह किया जाता है भ्रम सिद्ध हो जाता है।

जानने-मानने में सम्पूर्ण मूल्य समझ में आता है। इसके तृप्ति बिन्दु में इसकी पूर्णता की स्वीकृति होती ही है। इसी अधिकारपूर्वक अभ्युदय के अर्थ में व्यक्त होना प्रमाणित होता है। सम्पूर्ण मूल्यों का स्वरूप जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य और वस्तु मूल्यों के रूप में गण्य होता है। सुख, शांति, संतोष, आनन्द के रूप में जीवन मूल्य समझ में आता है। यह तभी प्रमाणित हो पाता है जब मानव ऊपर कहे गये दसों क्रिया रूपी जीवन को समझ लेता है। सुख का स्वरूप तुलन और विश्लेषण के साथ आस्वादन और चयन संतुलित होने की स्थिति में जागृति होने में आता है। इसे प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में समझ सकता है। इसी प्रकार चिन्तन, चित्रण के साथ तुलन, विश्लेषण संतुलित होने की स्थिति में शांति समझ में आता है। बोध और संकल्प के साथ चिंतन-चित्रण संतुलित होने की स्थिति में संतोष समझ में आता है। अनुभव और प्रामाणिकता के साथ बोध संकल्प रूपी ऋतम्भरा संतुलित होने की स्थिति में आनन्द समझ में आता है। इसमें सहजता यही है कि प्रत्येक मानव अपने में इन जीवन सहज क्रियाओं के साथ स्वयं से; स्वयं में; स्वयं के लिए परीक्षण-निरीक्षण पूर्वक सत्यापित करना बनता है। इस विधि से अस्तित्व सहज यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता को समझना संभव है। अस्तित्व ही परम सत्य वास्तविक और यथार्थ है। प्रत्येक एक अस्तित्व में अविभाज्य है। - अ.श. (2001) २८-३३

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