मानव परंपरा उत्तरोत्तर जागृत होने के रुप में परावर्तित रहता ही है। प्रत्यावर्तन में सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द से सराबोर रहता ही है। मानवाकाँक्षा अपने आप में कार्य व्यवहार व्यवस्था विधि से प्रमाणित होता ही है। यही ‘जीने’ का तात्पर्य है। अर्थात् कार्य, लक्ष्य और प्रयोजन प्रमाण होना, उसकी निरंतरता बने रहना ही जीने का तात्पर्य है।
मानव कुल में से ज्ञान विज्ञान विवेक प्रमाणित होता है। यही निर्विवाद स्वत्व का स्वरुप है। ऐसे स्वत्व परावर्तन में सार्थकता का आंकलन और स्वीकृति के आधार पर ही स्वत्व में आंकलन बनता ही रहता है, निरंतर श्रेष्ठता की ओर हम अपने में से प्रमाणित होना बनता ही है। एक बार प्रमाणित होने के बाद प्रमाण विधि में श्रेष्ठता की श्रृंखला बन जाती है। यह प्रत्यावर्तन में दृढ़ता का सूत्र बनता है। मानव में प्रमाण विधि से ही सार्थक पूंजी, प्रत्यावर्तन विधि से निरंतर प्रखर और वृद्धि होते ही जाता है। वृद्धि मतलब आज एक मुद्दे में प्रमाणित हुए, कल दो मुद्दे में, परसों तीन मुद्दे में प्रमाणित होने की स्वीकृति समाहित होती जाती है। यह प्रत्यावर्तन क्रिया बोध और अनुभव में समाहित होते रहने से है अर्थात् स्वीकृति रहने में है, यही पुनःश्च परावर्तन के लिए पूंजी बना रहता है।
ऐसे अनुभव ही बोध में समाधान के रुप में अवस्थित रहता है। फलस्वरूप परावर्तन में हम समाधान को प्रमाणित कर पाते हैं। इस विधि से परावर्तन क्रिया अनुभव के लिए नित्य स्रोत होना प्रत्यावर्तन विधि से स्पष्ट होता है। जागृति को प्रमाणित करने के लिए यही सूत्र और व्याख्या है। हर प्रत्यावर्तन अनुभव सूत्र है। हर परावर्तन अनुभव सूत्र की व्याख्या है। इस विधि से मानव के स्वरुप का प्रमाण प्रत्यावर्तन में ज्ञान विज्ञान विवेक के रुप में, परावर्तन में कार्य व्यवहार व्यवस्था में भागीदारी के रुप में प्रमाणित होता है। यही जागृत परंपरा है। पीढ़ी से पीढ़ी इसको बनाये रखना हर मानव का कर्त्तव्य और दायित्व है। - क.द. १२६
जागृति = बन्धन मुक्ति
न्याय पूर्ण विचार से आशा बन्धन एवं विचार बन्धन से मुक्ति होती है।
- धर्म पूर्ण चिन्तन से अथवा चित्रण से इच्छा बन्धन से मुक्ति होती है।
- आत्मा-बोध से बुद्धि में अहंकार से मुक्ति होती है। भ्रमित बुद्धि ही अहंकार है।-व्य.द., 1978