- कल्पनाएं - आशा, विचार, इच्छा के संयुक्त रूप में प्रवाहित रहती हैं। जीवन शक्ति अक्षय होने के कारण, प्रत्येक व्यक्ति में कल्पनाशीलता का अक्षय होना पाया जाता है क्योंकि यह कल्पना, जीवन शक्तियों का ही प्रवाह है।
- कल्पनाएं, सत्य संकल्प के अनुरूप परावर्तित होकर मानव परम्परा के, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में सार्थकता को प्रमाणित करती है।
- प्रामाणिकता, परावर्तन के रूप में, स्वतंत्रता को व्यवहार में, प्रमाणित करती है। इसी क्रम में स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी, स्वयं स्फूर्त विधि से सम्पन्न होती है।
- अस्तित्व दर्शन, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण सहज प्रमाणों को सम्पूर्ण आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में प्रमाणित करना सहज होता है। यही जागृति पूर्णता का परावर्तन है।
- इसके प्रत्यावर्तन में जागृति सहज आनंद, अस्तित्व में नित्य अनुभूति, आनंद की निरंतरता के रूप में अथवा स्रोत के रूप में पाया जाता है। इस प्रकार जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन की सार्थकता स्पष्ट है।
मानवीयता पूर्ण आचरण परम आचरण है अथवा सम्यक आचरण है। यह आचरण मानवत्व का सूत्र और व्याख्या है क्योंकि अस्तित्व में प्रत्येक एक, अपने “त्व’’ सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इस क्रमानुगत विधि से मानव, “मानवत्व’’ सहित व्यवस्था है, यह प्रमाणित होता है। - म.वि. 26-28
मुख्यत: न्याय, धर्म, सत्य रूपी दृष्टियों की क्रियाशीलता वृत्ति में एवं फलन स्वरूप इनका साक्षात्कार चित्त में, बुद्घि में बोध और अनुभव की स्वीकृति, आत्मा में इनका अनुभव और अनुभव बोध तथा साक्षात्कार की पुष्टि चिंतन में सम्पन्न होना ही अनुभवमूलक जागृतिपूर्ण स्थिति गति होना स्पष्ट है। अतएव जीवन को विधिवत् चेतना विकास मूल्य शिक्षा विधि से मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद का अध्ययन एवं समझ लेना जीवन ज्ञान का तात्पर्य है। जीवन ही दृष्टा पद में होने के कारण अस्तित्व सहज सम्पूर्ण दृश्य का दृष्टा होना सहज है। इस प्रकार अनुभव करने वाली वस्तु जीवन है। अनुभव करने योग्य वस्तु अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व है। प्रमाणित करने योग्य वस्तु हरेक मानव है। प्रमाणित होने के लिये वस्तु अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था है। अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में अनुभव ही परम सत्य में अनुभव। आ.व., 73-76
वृत्ति में तुलन और विश्लेषण क्रिया निरंतर सम्पन्न होता ही रहता है। यह हर जीवन में जागृति के अनंतर निश्चय के अर्थ में ही सार्थक होना पाया जाता है। निश्चयता का ध्रुव बिन्दु जीवन में वहन क्रिया के रूप में ही होना समझ में आता है। वहन क्रिया क्षमता का द्योतक होता है। वही प्रकाशन और संप्रेषण क्रिया योग्यता के अर्थ में होना पाया गया। – म.वि. 152
(*इस ढंग से) परावर्तन-प्रत्यावर्तन को हम पहचानने, पहचानवाने के रुप में समझने, समझने के रुप में सीखने, सीखने के रुप में हम अपने में होना पाते हैं। इसमें से समझने समझाने का जो भाग है, इसी में परावर्तन प्रत्यावर्तन सुस्पष्ट होता है। प्रत्यावर्तन विधि से समझते हैं, समझाने की विधि से परावर्तित होते हैं। मानव के लिए जितनी भी क्रियायें हैं, वे कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित भेदों से हैं। इन सबके मूल में परावर्तन, परावर्तन के मूल में प्रत्यावर्तन, प्रत्यावर्तन के वैभव में परावर्तन क्रिया अनूस्युत विधि से संपादित होती है। - क.द. १२३