जागृत जीवन में बल व शक्ति
अक्षय बल | अक्षय शक्ति |
आत्मा में अनुभव बल, सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व में अनुभव होता है। | आत्म शक्ति प्रामाणिकता में प्रमाण, |
अनुभव बोध: बुद्धि में बोध, न्याय-धर्म-सत्य सहज स्वीकार बुद्धि बल में होता है। | प्रमाणित करने के लिए संकल्प शक्ति बुद्धि शक्ति में, |
चित्त में चिन्तन रूप में स्पष्ट होता है। | चित्रण क्रिया चित्त शक्ति में, प्रमाणित चित्रण करने में, भाषा भाव (अर्थ) समेत चित्रण है। चित्रण जिसमें भाव भंगिमा मुद्रा अंगहार समाया रहता है। |
वृत्ति में तुलन क्रिया में न्याय-धर्म-सत्य का स्पष्ट होना, विश्लेषण सम्पन्न होता है। | प्रमाणीकरण विधि-विधानों का विश्लेषण करना ही विचार है। |
न्याय-धर्म-सत्य सम्मत मूल्यों का आस्वादन मन में सम्पन्न होता है। यह सदा-सदा होता है। इसलिए यही जागृति सहज मनोबल अक्षय है। | प्रमाणित होने के लिए निश्चित विचारों के अनुसार संबंधों का चयन क्रिया कर पाने की आशा में, से, के लिए किया जाना स्पष्ट है। |
जागृत मानव परम्परा में अनुभव प्रमाणों को प्रमाणित करने में जीवन जागृत रहता है। कल्पनाशीलता जागृति के अनुरूप कार्य करता है अर्थात् प्रमाणों के बोध सहित बुद्धि में संकल्प, संकल्प के अनुरूप चिन्तन-चित्रण कार्य चित्त में सम्पन्न होता है। फलत: चित्रण के अनुसार तुलन-विश्लेषण होता है। पुनश्च प्रमाणों के आधार पर आस्वादन पूर्वक चयन क्रिया मन में सम्पन्न होती है। यही जागृति के अनुसार होने वाले परावर्तन प्रकाशन है।
आस्वादनायें प्रमाणों के प्रकाश में प्रकाशित होने के फलस्वरूप तृप्त, संतुष्ट समाधान के रूप में परावर्तन सहज है यही जागृत जीवन का फलन है। संविधान – ४६, ५५
मानव में अनुभव के रूप में स्थिति, प्रमाण के रूप में गति दिखाई पड़ती है। यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता का बोध सहित बुद्धि ही स्थिति एवं उसे प्रकाशित करने की प्रवृत्ति के रूप में संकल्प ही गति है। बोध ही अनुभव और प्रमाण