परिणामों के रूप में दृष्टव्य है। ऐसे भौतिक-रासायनिक रचनाओं में से एक रचना मानव शरीर भी है। मानव शरीर रचना विधि मानव परंपरा में सर्वविदित है। इसीलिये जीवन ज्ञान की आवश्यकता अति अनिवार्य है। – स.श. 58-60

(i) जीवन

अस्तित्व में जागृति निश्चित होने के प्रमाण में ज्ञानावस्था की अभिव्यक्ति है। ज्ञानावस्था में मानव ही गण्य है। मानव परंपरा संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता के संयुक्त रूप में तृप्त होना पाया जाता है। ज्ञान का मूल स्वरूप जीवन ज्ञान और अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व रूपी व्यवस्था का ज्ञान है। जीवन ज्ञान मानव स्वयं अपने जीवन सहज क्रियाकलापों के आधार पर विश्वास करना बन पाता है। यह मूलत: अनुभव सहज क्रिया है। इसको जानना-मानना एक आवश्यकता है ही। जीवन को जानने-मानने के क्रम में शरीर रचना और शरीर सीमाओं के संदर्भ में भले प्रकार से पारंगत होना एक आवश्यकता है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में ही ज्ञानावस्था प्रकाशमान होने के आधार पर ही मानव सहज विधि से ही

अपना ही कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता शरीर से भिन्न तरंग के रूप में अनुभव करना बनता है।

  • आशा, विचार, इच्छाएँ जीवन सहज क्रिया होने के रूप में स्वयं से, स्वयं के लिये परीक्षण-निरीक्षण कर सकता है।
  • आस्वादन, तुलन, चिन्तन, बोध क्रम में अध्ययन विधि से जो अनुभूतियाँ प्रतीत होते हैं या भास-आभास होते हैं इसका परीक्षण स्वयं ही हर मानव, हर काल में, हर देश में किया जाना समीचीन है। इन क्रियाकलापों के निरीक्षण से पता लगता है कि जीवन्त मानव में आस्वादन का अनुभव भास; न्याय, धर्म, सत्यरूपी नित्य वस्तु का भास होना, हर व्यक्ति अपने से निश्चय कर सकता है। चिन्तन में ही न्याय, धर्म, सत्य का आभास होना और प्रतीति होना प्रमाणित होता है।
  • साक्षात्कार अपने में प्रयोजनों* (*प्रयोजन = न्याय धर्म सत्य) का निश्चयन सहित तृप्ति के लिये स्रोत रूप में अध्ययन विधि से पहचान लेता है। फलस्वरूप बोधपूर्वक सार्थकता सहित न्याय, धर्म, सत्य सहज स्वीकृति ही संस्कार और बोध रूप में जीवन में अविभाज्य क्रिया रूपी बुद्घि में स्थापित हो जाता है। यही अध्ययन पूर्वक होने वाली अद्भुत उपलब्धि है। न्याय सहज साक्षात्कार सह-अस्तित्व सहज संबंधों का साक्षात्कार सहित मूल्यों का साक्षात्कार होना पाया जाता है। यही मुख्य बिन्दु है। सह-अस्तित्व सहज सम्बन्धों को पहचानने में भ्रम रह जाता है यही बन्धन का प्रमाण है। यही जीवन को शरीर समझने का घटना है।

बन्धन को जीवन क्रियाकलाप में जाँचा जाना एक आवश्यकता है। बन्धन का स्रोत भ्रमित जीवन क्रिया से ही समीचीन रहता है। यह प्रिय, हित, लाभ दृष्टियों के रूप में आहारादि विषय - प्रवृत्तियों दीनता, हीनता, क्रूरतावादी मानसिकता सहित प्रकाशित होती है। ऐसे क्रियाकलाप पर्यन्त जीवन भ्रमित रहना स्पष्ट होता है। जीवन अपने को भ्रमित स्वीकारना बनता नहीं, निर्भ्रम होने की चाहत जीवन में बना ही रहता है। यही भ्रम-मुक्ति का सूत्र बनता है। अतएव भ्रमवादी जितने भी क्रियाकलापों को फैलाए रहते हैं उसकी निरर्थकता का आंकलन होता है, सार्थकता के लिये प्रयासोदय होता है। यही जागृति क्रम में होने वाली सह-अस्तित्व सहज वैभवशाली कार्य है। - आ.व. (२०००), 49-50

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