अनुभव मानव सहज अपेक्षा एवं वैभव है। मुख्य रूप में इन्द्रिय सन्निकर्षात्मक स्वीकृतियाँ आबाल-वृद्घ पर्यन्त प्रभावित रहता ही है। इसके मूल्यांकन के लिये और समीक्षा के लिये मूल्य मूलक व लक्ष्य मूलक सिद्घांत, सूत्रों व व्याख्याओं के प्रति मानव का प्रमाणित होना आवश्यक है। क्योंकि इन्द्रिय सन्निकर्षात्मक विधियों, कार्यों और इसके लिये आवश्यकीय साधनों की संग्रह विधियों से कोई भी समुदाय परंपरा मानवापेक्षा व जीवनापेक्षा को प्रमाणित करने में असमर्थ रहा है अथवा पराभवित रहा है। इसी के साथ-साथ समाधान, समृद्घि, अभय व सह-अस्तित्व की अपेक्षा हर समुदायों में बना ही रहा किन्तु प्रमाणित नहीं हो पाया है। इस तारतम्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि आदि काल से ही मानव सार्वभौम शुभ चाहते हुए अभी तक पराभवित होने का कारण एकांतवादी व भोगवादी प्रवृत्ति ही है। वैभवित होने का मार्ग भी सुस्पष्ट हो चुका है। यह केवल सह-अस्तित्व में अनुभवमूलक प्रणाली ही है जो लक्ष्य मूलक, मूल्य मूलक अपेक्षाओं को सार्थक रूप देने में समर्थ होना देखा गया है। मूल्य मूलक प्रणाली से स्वाभाविक रूप से मानवापेक्षा सफल हो जाता है। लक्ष्य मूलक प्रणाली से जीवनापेक्षा सार्थक होना देखा गया है।

प्रणालियाँ मूलत: इन्द्रिय सन्निकर्षात्मक अथवा अनुभवात्मक होना ही देखा गया है। इन्द्रिय सन्निकर्षात्मक प्रणालियों पर आधारित प्रयोगों को मानव ने इस धरती पर किया है। इसका समीक्षा पहले हो चुका है। अब केवल मूल्य मूलक, लक्ष्य मूलक विधि ही सम्पूर्ण मानव के लिये शरण होना समीचीन है। मानव में मूल्य व लक्ष्य की अपेक्षा सदा रहते हुए इसके विपरीत प्रणाली से इसको पाने की अपेक्षा किया। - आ.व. 224-225

(E) जागृति सहज मार्ग

सर्वशुभ का स्वरूप समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व ही है; और हम समाधानित रहने की स्थिति में ही समस्याओं का निराकरण कर पाते हैं। इसे वर्षों-वर्षों अनुभव कर देखा गया है। ऐसे समाधान अनेक दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य, आयामों के लिये आवश्यक होना पाया गया है। प्रत्येक मानव अपने में समाधानित होने की विधि मूलत: ‘‘मानव जाति एक, कर्म अनेक’’ के रूप में देखने, समझने, करने, करने के लिये मत देने के रूप में होना पाया गया।

मानव जाति को सर्वमानव में, से, के लिए अपेक्षित सर्वशुभ का धारक-वाहकता के रूप में होना, पहचाना गया है। सर्वशुभ ऊपर कहे हुए समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व रूप में होना देखा गया है। यह समाधान, समृद्घि का प्रमाण रूप में जीकर देखा गया है। इन दोनों का धारक, वाहक होने के उपरान्त अभयता अखण्ड समाज और सह-अस्तित्व का प्रमाण अनिवार्य हो जाता है। इस अनिवार्यता को सहज सुलभ रूप में समाधानित करने की विधि जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान पूर्वक होता देखा गया है। जीवन ज्ञान ही परमज्ञान होने के कारण सर्व मानव में अभयता का स्रोत सहज विधि से वर्तमान होना देखा जाता है। देखने का तात्पर्य समझने से है। समझ अपने मूलरूप में जानना, मानना, पहचानना निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित है। समझ का धारक-वाहकता जीवन सहज महिमा होना देखा गया है। जानने, मानने के क्रम में ही जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान पूर्वक ही प्रत्येक मानव समाधानित हो जाता है। यही सर्वतोमुखी समाधान का नित्य स्रोत है। इसके मूल में सत्य यही है कि अस्तित्व नित्य वर्तमान है। अस्तित्व न बढ़ता है न ही घटता है। अस्तित्व में जीवन भी अविभाज्य है। अस्तित्व में ही रासायनिक, भौतिक रचना-विरचना

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