सत्य ही, नियम, न्याय व धर्म के रूप में परिप्रेक्ष्यानुसार समझ में आता है अथवा अवधारणा व अनुभव मूलक क्रम में प्रमाणित होता है। - म.वि. 203
जागृति का प्रमाण अस्तित्व में प्रत्येक-एक व्यवस्था के रूप में कार्यरत रहने और समग्र व्यवस्था में भागीदारी सूत्र में सूत्रित रहने की सत्य में जानना-मानना-पहचानना-निर्वाह करना ही है। अस्तित्व में इस तथ्य के प्रति तभी संभव होना पाया गया कि जीवन ज्ञान स्पष्टतया हमें अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित होने के रूप में देखा गया। इस प्रकार जागृति का तात्पर्य सह-अस्तित्व में अनुभव मूलक मानसिकता भी होना स्पष्ट है। जबकि अनुभव मूलक विधि से यह स्पष्ट है कि जीवन का मूल बलों का नाम आत्मा, बुद्घि, चित्त, वृत्ति और मन है। इनका स्थिति कार्य रूप अनुभव, प्रमाण, बोध, चिन्तन, तुलन और आस्वादन क्रियाएं हैं। यह प्रत्येक मानव में प्रमाणित होने का स्रोत और व्यवस्था है। यही तथ्य मानव अपने में जागृति को आंकलित करने का स्रोत जागृत मानव परंपरा ही है। यही अनुभव सम्मुच्चय का भी स्वरूप है। मन वृत्ति का; वृत्ति चित्त का, चित्त बुद्घि का, बुद्घि आत्मा का अनुभव करता है। क्योंकि हर आस्वादन तुलन के कसौटी में, हर तुलन चिन्तन (साक्षात्कार) के कसौटी में, संपूर्ण साक्षात्कार बोध के कसौटी में, समग्र बोध अनुभव के कसौटी में, संपूर्ण अनुभव अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व के कसौटी में संतुलित, नियंत्रित होने की जीवन सहज कार्यकलाप को देखा जाता है। यही प्रत्येक व्यक्ति में स्वनियंत्रण का और संतुलन का सूत्र है। - आ.व. 198-199
अनुभव अस्तित्व में ही होना पाया जाता है। अनुभव के पहले समझदारी जानने-मानने-पहचानने के रूप में होना पाया जाता है। यह सच्चाई का अध्ययनपूर्वक होन वाला अवधारणा, संस्कार है। इसके पूर्व रूप में विचार और चित्रण ही रहता है। यही श्रुति, स्मृति, शब्द और चित्रण है। शब्द और चित्रण के आधार पर कितने भी क्रियाकलापों को मानव संपादित करता है यह सब अस्थिरता के साथ ही जूझता हुआ देखा गया है अस्थिरता में भ्रम ही प्रधान कारण है। इसीलिये ही स्मरण और चित्रण के उपरान्त कहीं न कहीं अस्थिरता-अनिश्चयता को प्रकाशित करता ही है। इसी सीमा तक हम इस बीसवीं सदी के अंत तक झेलते आये हैं। स्थिरता की स्वीकृति बोध रूप में ही होना फलस्वरूप व्यवहार में न्याय-समाधान-सत्य प्रमाणित होना पाया जाता है। ऐसा बोध जानने-मानने-पहचानने का ही महिमा है। यह क्रिया जीवन में ही जागृति सहज विधि से होने वाली वांछित प्रक्रिया है।
अस्तित्व में अनुभव सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में ही देखा गया है। सत्ता में संपृक्त रहने के आधार पर ही क्रियाशीलता नियंत्रण, संतुलन, संरक्षण साम्य ऊर्जा स्रोत होना देखा गया है। इसीलिये प्रकृति में नियंत्रण, संरक्षण निरंतर बना ही रहता है। - आ.व. 149-150
(iii) बोध, अनुभव
भ्रम मुक्ति की कल्पना मानव परंपरा में आदिकाल से अथवा सुदूर विगत से रही है। अर्थात् भ्रम से मुक्त होने का आश्वासन वाङ्मय में सुदूर विगत से सुनने को मिलता है, उनका भाषा जीवन मुक्ति रही है। भाषा के रूप में यह प्रचलित है ही। मुख्य रूप में बंधन का स्वरूप, मुक्ति की आवश्यकता, उसकी समीचीनता और लोकव्यापीकरण यही मुख्य