जीवन में होने वाली सामान्य क्रियाएँ शक्ति और बल के रूप में अध्ययन से बोध और निश्चयन होती है। हरेक व्यक्ति अपने ‘‘स्व’’ जीवन क्रियाकलाप को अध्ययनपूर्वक बोध सम्पन्न हो जाते हैं उसी क्षण में यह निश्चयन होती है कि जीवन क्रियाएँ सभी जीवन में समान होना पाया जाता है। जीवन शक्ति और बल भी अपने में अक्षय होना जीवन क्रिया और उसकी अक्षुण्णता समझ में आते ही उसकी अक्षुण्णता का बोध होता है। अवधारणा सुदृढ़ हो जाती है। इसी तथ्य वश जीवन शक्तियों और बलों की अक्षयता इनको कितने भी उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता विधि से नियोजित करने के उपरांत भी जीवन शक्ति और बल यथावत रहना स्वयं में, से के लिए अनुभूत होता है। अनुभूत होना ही जागृत होना है। जीवन ज्ञान सहित ही अस्तित्व में अनुभूत होना स्वाभाविक होता है। फलस्वरूप जीवन सहज जागृति मानव सहज जीवन लक्ष्य समान होना विदित होता है। इस प्रकार जीवन लक्ष्य, जीवन शक्तियाँ, जीवन बल, जीवन सहज क्रियाकलाप और जीवन रचना प्रत्येक जीवन में समान होना अनुभव होता है। फलस्वरूप सह-अस्तित्व में विश्वास होना, अनुभव होना स्वाभाविक है। फलस्वरूप सर्वशुभ में, से, के लिए जीना स्वाभाविक प्रक्रिया बनती है। यही सार्वभौम व्यवस्था और अखण्ड समाज का मूल सूत्र होना पाया जाता है न कि शरीर रचना की विविधता।
जागृत जीवन विधि से ही मानव परंपरा में अनुभव प्रमाण और प्रयोग प्रमाण व्यवहार में सार्थक विधि से प्रमाणित होता है। यही अनुभवमूलक जागृति सहज जीने की कला, उसकी महिमा है। - आ.व. 62-64
(ii) न्याय धर्म सत्य सहज जागृति
मान्यताएं पूर्वानुक्रम, परानुक्रम भेद से पाई जाती हैं। पूर्वानुक्रम पद्धति प्रणाली, मानवीयता पूर्ण विचार-चिंतन-बोध-अवधारणा और अनुभव मूलक होने के क्रम में अध्ययन गम्य है। परानुक्रम मान्यता का स्रोत शरीर, मानव, जीवजगत से प्राप्त प्रेरणाओं के रूप में है और (इनमें से जितनी भी प्रकार से इन्द्रिय सन्निकर्षपूर्वक माना गया है अथवा) जितनी भी मान्यताएं होती है। वे सब प्रिय, हित, लाभात्मक, तुलन विश्लेषण संबधों के अधार पर संयत होना पाया जाता है। संयत होने का तात्पर्य प्रिय हित लाभ प्रवृत्ति यां न्याय, धर्म, सत्य संगत होने से है। - म.वि. ४९
(*इस ढंग से यह स्पष्ट है की) शरीर को सत्य समझकर आस्वादन करने की स्थिति में, जीवन तृप्ति का स्रोत नहीं बन पाता। अतएव जीवन तृप्ति विधि से ही आस्वादन सार्थक होता है अर्थात् जीवन में, से, के लिए जीवन समझ में आने के बाद ही आस्वादन की सार्थकता, नियम और न्याय के रूप में निरंतर ही सुख, सुन्दर, समाधान के प्रमाणों सहित है।
जीवन में दृष्टियां प्रिय, हित, लाभ, न्याय-धर्म-सत्य को परिशीलन करने के क्रम में कार्यरत हैं। जिसमें से प्रिय-हित लाभ दृष्टियां इन्द्रिय सन्निकर्ष होने के आधार पर भ्रमात्मक होना अथवा भ्रमपूर्वक ही प्रिय-हित-लाभ को सुख का आधार मानना मूल्यांकित हो चुका है। अतएव जीवन, जागृति पूर्वक, न्याय-धर्म-सत्य पूर्ण दृष्टियों से स्वयं को और अस्तित्व को देखने योग्य होता है। देखने का तात्पर्य समझने से है। - म.वि. ६१, ७८
देखने वाली इकाई मानव ही होना स्पष्ट है। भ्रमित मानव में देखने का गुण प्रिय, हित, लाभ; जागृत मानव में न्याय, धर्म और सत्य पूर्ण विधाओं के रूप में कार्यरत होना अध्ययन गम्य है। प्रिय, हित, लाभात्मक दृष्टियाँ क्रम से इंद्रिय